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The book and the monster

It was a lonely night for him. He had nothing much to do, and neither felt the zeal. He saw the book resting, looking him into the face, on the messed up dining table. The book had been long on the list of his pending items. Just for the sake of killing the time, as he was not able to sleep, he picked up the book.

A mild wind was blowing through the room. Wind chimes tied on the curtain rail behind him swayed incessantly, producing a pleasant but mysterious noise. The book had involved him completely. Quite oblivious to his surrounding he was completely in its clasp. He was so engrossed that even if something lurked out of the dark behind the curtains, he would not have noticed. Just as he turned to the last page of the first chapter, for fraction of a second, his attention moved away from the book.

“Is there someone behind me?” He asked to himself

Consciously he turned back to flush away his apprehension. The curtains flew and wind chimes chimed. He went back into the book. But, still, he could not get the doubt out of his mind. He still felt as if someone was behind him. It seemed that the something wanted his attention, purposefully.

“Is it because of the book? Is someone or something jealous of the fact that the book has got my full attention and nothing else?” he asked to himself once again

He moved his glance away from the pages of the book. And then to greatest of his horrors, he turned into a monster!

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चंद्रग्रहण – २

मीठे नींद में डुबे शंकर के आनंद में तब खलल आ गया जब उसके चेहरे पर हलकी हलकी पानी की फुहार आने लगी। आधी कच्ची आधी पक्की नींद में जब उसने आँखे खोली तो देखा कि झोपडी की खिड़की खुली हुई है और उसमे से हवा के साथ बारिश का पानी भी अन्दर आ रहा है। नींद टूटने से शंकर थोडा  सा झुंझला सा गया था। उसने जैसे ही खिड़की बंद करने के लिए उठना चाहा, बाहर टंगे लालटेन की ज़मीन पर पड़ती रौशनी में उसे एक परछाई दिखी। और अगर वो एक साधारण परछाई होती तो शायद शंकर की सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे नहीं रुक जाती। परछाई एक लाश की थी जो झोपडी के छप्पर से लटक रही थी, हवा उस लाश को अपने साथ दाये-बाए हिलाए जा रही थी । कुछ क्षणों के लिए शंकर समझ न पाया कि क्या करे! फिर उसने धीरे से खुद को खिड़की के पास खिंचा तो पाया कि जो छप्पर से लटक रही थी वो कोई लाश नहीं थी। बल्कि किसी ने खेत से ला कर काकभगोडे को टांग दिया था।

“कोई पागल ही ऐसा कर सकता है!” शंकर ने बुदबुदाया

शंकर अब भी आश्चर्यचकित था, मगर अब उसके दिल से वो दहशत जा चुकी थी जो परछाई को देखते ही उसे महसूस हुई थी। वो आस पास का जायजा लेने जब पीछे मुड़ा तो उसने पाया की चूल्हे पर रखा वो बर्तन गायब है। उसकी समझ में आ गया कि जब वो सो रहा था, जरूर झोपडी का मालिक वापस आया होगा। काकभगोडे को टांगने वाली करतूत भी हो न हो उसी की होगी। शंकर उसे धुन्धने झोपडी के बहार आ गया। हवा अब और उग्र हो चली थी। लालटेन की लुपझुप करती लौ देख शंकर को दिए और तूफ़ान वो पौराणिक संघर्ष याद आ गया। जाने क्या सोच कर उसके परेशान चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गयी।

शंकर ने उस काकभगोडे को नीचे उतरने के लिए जब पकड़ा तो देखा कि काकभगोडे के आँख, नाक और मुंह बना दिए गए थे। जिस लाल रंग से उन टेढ़ी मेढ़ी आकृतियों को बनाया गया था वो अभी तक सुख भी नहीं था। शंकर ने काकभगोडे  को उतार कर ज़मीन पर धर दिया। ओटले के किनारे पर ही वो बर्तन भी रखा था जो पहले शंकर ने चूल्हे पर रखा देखा था। जब शंकर ने ध्यान से देखा तो पाया बर्तन में अभी भी कुछ रखा हुआ था, पास जाने पर उसने जो देखा उससे उसे एक लघु हृदयाघात आ गया। बर्तन के अन्दर एक कुत्ते का सर था। शंकर वही का वही ज़मीन पर बैठ गया। यह सब क्या हो रहा था उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। उसकी तार्किक शक्ति उसका साथ छोडती सी मालुम हो रही थी। जो कुछ आज रात उसके साथ हो रहा था, उस सब की व्याख्या शायद ही कोई विज्ञान दे सकता था। पर यह सब हो तो रहा था, वो चाहे मने या न मने। कुत्ते का सर देखते ही उसे लगा था की ये उसी कनकटे कुत्ते का सर होगा। न जाने क्यों आज रात घूम फिर कर शकर का सामना उस कनकटे कुत्ते से हो रहा था।

उसने हिम्मत जुटा कर अपने दर की पुष्टि करने के लिए ज्यो ही बर्तन में झाँका, एक अशांत से अट्टाहस ने उसकी रूह को कंपा दिया। कुत्ते का कान तो कटा हुआ ही था, लेकिन यह हंसी किसकी थी। पहले तो उसे लगा कि लक्कड्बग्घो की आवाज़ है, लेकिन तुरंत ही उसका यह कयास असत्य सिध्द हो गया। सामने से एक अधनंगा व्यक्ति हाथ में कुल्हाड़ी लिए पागलों सी चाल में शंकर की तरफ बढ़ा जा रहा था। वो पागल आसमान को ताकता बेतरतीब सा शंकर के बिलकुल पास आ गया। जब शंकर ने ध्यान से देखा तो पाया कि वो तो पागल रामकृष्ण ही था। तो क्या वो अपने गाँव के इतना करीब आ गया था, कि रामकृष्ण के खेत में पँहुच चूका था? रामकृष्ण को देख उसके खोये होश वापस आये। मगर कुत्ते के सर को पकाने का वाली बात उसके समझ न आई। रामू पागल तो था पर ऐसी हरकते गाँव में तो नहीं करता था।

“तूने उसे बचा लिया?” रामकृष्ण ने चीखते हुए शंकर से पूछा

 

“किसे?”

“इसे, तेरी भाभी को।” पगले ने काकभगोडे की और इशारा करते हुए बोल

“अरे, ये लक्ष्मी भाभी नहीं है। बस एक काकभगोडा है, बस। लक्ष्मी भाभी तो मर चुकी है ना ।” उसने रामू को समझाने की कोशिश की

यह सुनते ही रामू फिर अपने भयावह अंदाज़ में हँसने लगा।

“तू भी बाकी सब की तरह पागल हो गया है, शंकर” उसने कहा

यह सुन कर शंकर को क्षण भर के लिए हँसी आ गयी। खुद पागल हो कर यह पगला मुझे पागल बोल रहा है। उसने सोचा कि जाने दो इससे बहस करके कोई फायदा नहीं है, मैं कुछ करके यहाँ से निकलता हूँ।

“माफ़ कर दे भाई, मैं इसे वापस टाँग देता हु” कहते हुए शंकर ने काकभगोडे को वापस छप्पर पर टाँग दिया

रामू सर हिलाने लगा। “अब कोई फायदा नहीं। वो तो चली गयी ना।” इतना कहते कहते रामू ने शंकर का हाथ पकड़ लिया। शंकर पूरी तरह सतर्क हो चूका था। वो रामू की और से आने वाले किसी भी प्रकार के हमले के लिए तैयार था।

“चल, आ मैं मिलवाता हु तुझे उससे।” रामू ने उसे खींचते  हुए कहा

“नहीं नहीं, मैं घर जाता हूँ ” उसने कहा 

“नहीं” रामू चिल्लाया “अब तू नहीं जा सकता, वो तुझे जाने नहीं देगी, इतना आसान नहीं है।”

शंकर रामू के ऐसे बर्ताव को देख कर घबरा गया। इसके पहले रामू को कभी इतना उग्र उसने नहीं देखा था। सीधा सादा रामू, गाँव में रोज सुबह हर आने जाने वाले को ‘राम-राम’ करता था। गाँव के बच्चे उसका मज़ाक बनाते कभी उसका सामान छुपा देते तो कभी उसके पीछे टिन के खाली डब्बे बांध देते। मगर रामू बस उन उत्साहित बच्चो को देख कर हँसता रहता। लोग ज़रूर कहते थे कि कई साल पहले उसने अपनी बीवी, लक्ष्मी को मार दिया था। लेकिन शंकर को इस बात पर मुश्किल से ही यकीन होता था।

रामू अब शंकर को खींचता हुआ अँधेरे में ले जाता जा रहा था। शकर ने हाथ चुदने की पुरजोर कोशिश की पर न जाने कहाँ से उस पागल में उतनी शक्ति आ गयी थी कि शंकर जैसा हट्टा-कट्टा युवक भी हाथ नहीं छुड़ा पा रहा था।

इससे पहले कि वो कुछ समझ पता, रामू उसको एक आम के पेड़ के पास ला चूका था।

“यही रहती है वो। रोज़ मुझे यहाँ बुलाती है।” आँखें मटकाते हुए रामू ने हौले से शंकर के कान में कहा

“वो जो घर में खाना था न, इसी के लिए बनाया था। इसी बहाने तो इसको घर तक लाया था। पर तूने उसे भगा दिया। नालायक।” ये कहते हुए रामू की आँखें अंगारों की तरह जल उठी, नथुने फूल गए। पूरी रात में पहली बार शंकर बुरी तरह से डर चूका था। उसने अपने हाथ को एक झटके से रामू की पकड़ से छुड़ा लिया।

“वो देख” रामू ने लालटेन पेड़ की ओर की और अजीब सी भाषा में कुछ बोलने लगा। पेड़ उन दोनों से कुछ गज की दुरी पर था, अँधेरे में लालटेन की रौशनी जैसे ही पेड़ पर पड़ी कुछ सरसराहट सी हुई। शंकर न चाहते हुए भी उस ओर देखता रहा। पत्तो की आड़ में शंकर को दो आंखें दिखी, जो लालटेन की रौशनी से टिमटिमाने लगी थी। बिना कुछ सोचे शंकर वहाँ से भाग। पीछे से रामू के चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी। कुछ दूर जा कर जब उसने देखा तो रामू पेड़ पर  अंधाधुंध कुल्हाड़ी मार रहा था। उसने वहाँ से भाग जाना ही बेहतर समझा। जैसे जैसे वो दूर जाता जा रहा था, रामू की आवाज़ हलकी और भ्रामक होती जा रही थी। उसे लगा कि रामू किसी से झगडा कर रहा था, शायद किसी महिला से।

बेतहाशा भागता हुआ शंकर वापस रामू की झोपडी पर आ पंहुचा। उसने अपनी साइकिल ली और बिना वक़्त गंवाए रवाना हो गया। बारिश तो अब थम चुकी थी, ग्रहण भी छुटने को था। चन्द्रमा की हलकी हलकी दुधिया रौशनी से थोड़ी दृष्टता लौट रही थी। शंकर अपनी पूरी उर्जा से पैडल चला रहा था। भूख प्यास से बेहाल हो चुके उसके शरीर में अब कुछ ख़ास ताक़त बची नहीं थी। ये तो उसका निश्चय ही था जो उसे जिलाए हुए था। आँखों की पलके अब कई मनो के भार के नीचे दबती जा रही थी और सोचने की शक्ति अब क्षीण हो चुकी थी।

एक बार फिर शंकर को दूर कुछ रौशनी सी दिखाई पड़ी। वो उस ओर बढ़ चला। लेकिन इस बार वो सतर्क था, कि कही फिर किसी सरफिरे के घर न पहुच जाए। झोपडी के बाहर लालटेन आँगन में रखी हुई थी। जैसे ही उसने झोपडी के बाहर साइकिल रोकी, अन्दर से एक चितपरिचित आवाज़ उसे सुनाई पड़ी। इसमें कोई शक न था कि वो आवाज़ रामू के हंसने की थी। मगर शंकर को इस बात पर अब भी विश्वास न हुआ। वो जब रामू की झोपडी से निकला था, तब से अभी तक उसने नाक की सीध में ही साइकिल चलायी थी। घूम कर वापस वह पहुचने का तो सवाल ही नहीं उठता था। इतना सब हो जाने के बाद भी उसके अन्दर कहीं एक तार्किक जीवित था। वो साइकिल रख कर दरवाज़े की ओर बढ़ा।

“मैंने कहा था, कि इतना आसान नहीं है।” रामू ने अंदर से अट्टाहस करते हुए कहा

शंकर की नींद अब पूरी तरह उड़ चुकी थी। उसने साइकिल उठाई, फिर से उसने पूरी ताकत से पैडल चला शुरू कर दिए। वो यही सोच रहा था कि अगर इस दिशा में जा कर वो वापस शंकर के घर पहुचता है तो शायद वो सीधे नहीं एक चक्कर में जा रहा है। इस बार उसने इस बात का ख्याल रखा कि वो साइकिल सीधी, बिलकुल सीधी चलाये।

काफी देर बाद, उसे फिर से एक झोपडी दिखी। वो मन ही मन यह मना रहा था कि इस बार तो वह किसी और की झोपडी पर पंहुचा होगा। मगर उसके सारी धारणाएं एक ही पल में चकनाचूर हो गयी। इस बार तो रामू बहार आँगन में ही खड़ा था और उसे लगातार घुर रहा था।

“मत भाग, वो तुझे जाने नहीं देगी।” उसने कहा “चल हम दोनों उसको ख़त्म कर देते है।” ये कहते हुए रामू उसकी ओर बढ़ा।

“देख रामू, तूने अगर एक कदम भी इस ओर बढाया तो अच्छा  नहीं होगा।” उसने रक्षात्मक रुख अपनाते हुए कहा “इससे मेरा कुछ लेना देना नहीं, और उप्पर से मैं इन सब चीज़ों में नहीं मानता।” शंकर ने अपनी दलील दी।

“तुझे क्या लगता है कि लक्ष्मी मर गयी है, और उसकी आत्मा मुझे परेशान कर रही है?” रामू ने अपने सड़े दांत दिखाते हुए पूछा “वो नहीं मरी है, और न ही उसकी कोई आत्मा है। वो तेरी मेरी तरह नहीं है रे।” अब बात शंकर के समझ से परे जाती जा रही थी।

“ये बात तो मुझे शादी की पहली रात ही पता चल चुकी थी। मगर किसी ने मेरा विश्वास ही नहीं किया।” वो बोलता जा रहा था और शंकर बुत सा खड़ा सुनता जा रहा था। कुछ जाने की जिज्ञासा मनुष्य में एक ऐसा जूनून उत्पन्न कर देती है कि हर डर, हर खतरा उसके आगे छोटा लगने लगता है।

“हर रात वो मुझे खेत पर ले आती, फिर न जाने क्या क्या करने लगती। उसकी करतूतों से ही मेरी ज़मीन बंजर होती गयी।” रामू की आँखों में एक शोक सा भर आया था। “कितनी कोशिश करी मैंने उससे पीछा छुड़ाने की। तुझे भी बोल था मत आ, नहीं बचेगा।” ये कहते हुए उसके चेहरे के भाव अचानक वेहशी हो गए। वो शकर की और बढ़ा। शंकर ने उसे एक जोरदार धक्का दिया, जिसके चलते दोनों ज़मीन पर गिर गए। रामू का कन्धा पीछे पड़ी उसकी कुल्हाड़ी पर जा लगा। वो चीख उठा।

शंकर ने आव देखा न ताव। अपनी साइकिल उठा कर वो निकल पड़ा उस जगह से दूर। पीछे से अजीब सी हंसने की आवाज़े उसकी हृदयगति को बढ़ाये जा रही थी। वो आवाजें और तेज़ होती जा रही थी। पहले तो केवल रामू के चीखने की आवाज़ थी, पर धीरे-धीरे उसमे किसी और के रुदन और फिर लक्कड्बग्घो के रोने की और कई सारे उल्लुओं की  आवाज़ें मिलते गयी। शंकर पसीने में तरबतर निरावाकाश साइकिल चलता जा रहा था।

उस आवाजों को वो नज़रंदाज़ तो नहीं कर सकता था, पर उसे पता था कि अगर वो वहाँ से नहीं निकला तो उसके लिए अच्छा नहीं होगा। इस सब में एक बात तो उसके समझ बिलकुल नहीं आई, वो ये थी कि रामू ने उसे कब मन किया था कि इस ओर मत आ। और फिर उसको वो वाकया याद आया जो इन सब अनहोनी घटनाओ का अगुवा था। वो कनकटा कुत्ता। और कहीं न कहीं घूम फिर के उससे शंकर का सामना हो ही रहा था।

जो कुछ भी हो रहा था, वो सब उसकी समझ और उसके ज्ञान की व्याख्या से परे था। अब शंकर का शरीर जवाब दे रहा था, मगर उसका जज्बा उसे आगे बढ़ने को प्रेरित कर रहा था। रात का आखिरी पहर चल रहा था, दूर क्षितिज पर हलकी मधिम लालिमा दिखने लगी थी। उसके पेर पैडल पर ढीले हो चले थे। शरीर के कोने से शक्ति को खींच कर वो जैसे तैसे आगे बढ़ता जा रहा था।  उन आवाजों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा था। जाने क्या चल रहा है, और इस सबका अंजाम जाने क्या होगा। लेकिन एक बात तय थी, हार मान लेना उसके लिए एक विकल्प नहीं था। अगर वो आज हार मान लेता है तो, माँ का क्या और उसके छोटे भाई-बहनों का क्या।

नहीं। मुझे घर पहुचना ही होगा। उसने खुद से कहा और फिर एक बार साइकिल पर अपनी पूरी ताकत झोंक दी। पता नहीं कब, यूँ ही संघर्ष करते-करते वो ज़मीन पर गिर पड़ा। माँ का परेशान चेहरा उसे उप्पर बादलो में दिखाई दे रहा था। वो चाह रहा था कि माँ से कहे कि घर पहुच रहा हु, पर उसके शरीर ने होंठ हिलाने की भी शक्ति नहीं थी। धीरे से उसके मस्तिष्क ने भी उसका साथ छोड़ दिया, और वो वही मूर्छित हो गया।

 

शंकर की आँख खुली तो उसने पाया कि सुबह हो चुकी थी। रोटी सिकने की खुशबु घर में फैली हुई थी। उसने एक गहरी सांस भरी। कुछ क्षण के खालीपन के बाद अचानक उसके दिल में उस रात का ख्याल आया। और वो  गया! क्या वो जिंदा था? उसे तो यकीन था कि वो नहीं बचेगा।

“उठ गया तू…” माँ ने उसके सिरहाने दूध का गिलास रखते हुए कहा। और फिर आँखें बंद कर कुछ बुदबुदाने लगी। “…ले दूध पी” कह कर वो चोके की ओर चली गयी। दूध का गिलास होंठों से लगते ही शंकर को एहसास हुआ कि वो कितना भूखा था। शंकर ने एक घूंट में सारा दूध पी लिया। माँ अन्दर से कुछ लाल मिर्चें मुट्ठी में बाँध कर ले आई और शंकर की नज़र उतरने लगी। शंकर को अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि वो जीवित था। लेकिन जो कुछ उसके सामने हो रहा था उससे तो यही अर्थ निकल रहा था कि  वो सही सलामत था।

“क्या कर रही है?” शंकर ने पूछा तो माँ ने इशारे से उसे चुप रहने का आदेश दिया। माँ ने कई बार मिर्चियों को उसके सर से पाँव तक घुमाया और फिर अन्दर चोके में चली गयी और उनको जला दिया।  मिर्ची जलने की तेज़ ढान्स से शंकर खांसने लगा।

“तू अब ऐसे किसी उटपटांग काम के लिए बखत-बेबखत इधर उधर नहीं जाएगा।” माँ ने गुस्से में उससे कहा

“मेरी तो जान ही निकल गयी थी। न जाने सारी  रात तू कहाँ था। वो तो भला हो उस लड़की का जिसने तुझे गाँव के बहार बेहोश होते देख लिया।” यह सुनते ही शंकर का सर चकरा गया। किस लड़की ने उसे बेहोश होते देखा? उसने तो उस वक़्त आस-पास किसी को नहीं देखा था। वो हर पल आश्चर्यचकित, और ज्यादा आश्चर्यचकित होता जा रहा था।

“कौन?” अनायास ही उसके मुंह से निकल पड़ा

“अपने गाँव की नहीं है। पर बहुत भली है है। बहार झाड़ू लगा रही है।” माँ ने हल्की सी हंसी के साथ कहा

तभी एक सकुचाई सी आकृति कमरे में दाखिल हुई। सांझ के ढलते सूर्य की किरणे उसके ताम्ब्र वर्ण को और भी स्वर्णिम बना रही थी। दिन भर के काम से शायद उसके केश जो सुबह एक स्पष्ट छोटी में गुंथे हुए थे, अब स्वतंत्र हर ओर हवा में  डोल रहे थे। और उसकी आँखे झिलमिलाते दीपक सी, जैसे ही शंकर की दृष्टि से सम्मुख हुई तो छुईमुई सी सकुचा गयी।

शंकर अपने होश खो चूका था । वो भूल गया था कि एक रात पहले ही उसके साथ क्या हुआ था, वो भूल गया था कि कुछ पल पहले उसको अपने जीवित होने पर भी संदेह हो रहा था। उसे याद रहा तो बस उस युवती का शर्मीला चेहरा।

“लग गयी झाड़ू?” माँ ने उससे पूछा तो शंकर को एहसास हुआ कि कमरे में उसके और उस लड़की के अलावा कोई और भी था।

“बेटी, देख शंकर को होश आ गया। अगर तू नहीं होती तो न जाने ये नालायक खेतों में कब तक यु ही पड़ा रहता ।” माँ ने वक्र दृष्टि से शकर की और देखा। ” इसलिए ही बड़े-बूढ़े ग्रहण के वक़्त निकलने से मना करते है।” ये कहते हुए माँ फिर चोके  की और बढ़ चली। शंकर अभी भी एकटक उस लड़की को निहार रहा था। और वो वहाँ कड़ी शर्म में डूबी जा रही थी।

कमरे में एक बैचैन सी ख़ामोशी थी। “हमारी भैंस कैसी है माँ?” उसने बात पलटने के लिए माँ से पूछा

“बेटा उसने तो रात में ही दम तोड़ दिया।” माँ ने धीमी आवाज़ में कहा, शायद वो शंकर की चिंता को कम करना चाहती थी। लेकिन शंकर के दिमाग से सारी फ़िक्र, सारी चिंता काफूर हो चुकी थी। उसे प्रेम हो गया था।

वो लड़की शंकर के घर में ही रहने लगी। कुछ महीनो बाद शंकर ने उस लड़की से अपने प्यार का इज़हार कर दिया । और उसने भी शर्मा कर, लजा कर एक रुकी सी हामी भर दी। शंकर को तो लगा जैसे उसके जीवन को अपना मतलब मिल गया, शायद ही गाँव में शंकर से ज्यादा खुश व्यक्ति कोई होगा। माँ को तो वो पहले ही पसंद थी, पर शंकर के बाबूजी इस रिश्ते से नाखुश थे। लेकिन उनका मत शंकर के लिए कुछ ख़ास मायने नहीं रखता था।

कुछ ही दिनों में दोनों की शादी हो गयी। शादी के पहले ही महीने में शंकर की माँ चल बसी। बीमार तो वो कई दिनों से थी, और इसीलिए उसने जल्द से जल्द शंकर की शादी करा दी थी ताकि अपने रहते वो शंकर की शादी देख ले। शंकर शादी के बाद से गाँव के लोगो से कटा-कटा सा रहने लगा था, और माँ के बाद तो उसने किसी से भी मिलना बंद कर दिया था। दिन हो या रात, बस खेत पर ही काम करता रहता था। और वहाँ भी उसे लगातार निराशा हाथ लग रही थी। जिस साल पुरे गाँव की फसल अच्छी होती उस साल भी शंकर के खेत में बमुश्किल कुछ पैदा होता।

लोग कहने लगे कि शंकर पागल होता जा रहा था। नहना धोना उसके छोड़ दिया था, घर में रहना भी एक दी उसने छोड़ दिया। गाँव के चौक पर पड़ा रहता था। और एक दिन उसकी बीवी भी न जाने कहाँ चली गयी। लोगो ने आखिरी बार उसको शंकर के साथ एक रात को खेत में जाते हुए देखा। और फिर अफवाहे उड़ चली। शंकर ने भी रामू की ही तरह अपनी बीवी को मार डाला। या, उससे तंग आ कर उसकी बीवी भाग गयी। सच कोई नहीं जानता था। शंकर के भाई-बहिन भी नहीं। वो तो जैसे-तैसे इधर उधर काम करके अपना पेट पाल रहे थे।

रात होते ही शंकर खेत की ओर चल देता। वहाँ एक जामुन का पेड़ था, उसी के नीचे वो सोता था। उसके साथ एक कनकटा कुत्ता भी रहने लगा था। कुछ लोगो का कहना था कि हर रात शंकर उस पेड़ से न जाने किस भाषा में बात करता था।

फिर एक दिन किसी ने कहा कि शंकर के खेत में उसकी पत्नी की आत्मा भटकती है!

चंद्रग्रहण – 1

बात उन दिनों की है जब न TV था, न कंप्यूटर, न ही आज की तरह मोबाइल फ़ोन हुआ करते थे की कहीं भी हो एक नंबर घुमाया और मनचाहे व्यक्ति से बात हो गयी | बात है १९४० के दशक की, भारत आज़ाद हुआ ही था | पुरे देश में, खासकर के नौजवानों में एक नया उत्साह था, नयी उमंग थी | ऐसा ही एक उत्साही नौजवान था, शंकर | वैसे तो शंकर ने इंटर पास कर लिया था, जिसके आधार पर उसी कहीं भी अच्छी नौकरी मिल सकती थी| मगर उसने अपने गाँव में ही रहना बेहतर समझा| ३-३ छोटे भाई बहनों की परवरिश का बोझ उसके कन्धों पर ही था| वैसे तो उसके बाबूजी अभी तक चलते फिरते थे, लेकिन कमाने का हुनर उनमे न था| वो तो मलंग थे | गाँव के नजदीक ही एक खेडा था, उसी खेड़े की सीमा पे एक प्राचीन शिव मंदिर था | कहते है उस मंदिर को कोई १२०० साल पहले बनाया गया था, और जब से वो मंदिर बना है तब से शंकर के पुरखे उसके पुजारी हैं | शंकर के बाबूजी भी अपनी पुश्तैनी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मंदिर से लग गए | पहले तो सब ठीक था लेकिन शंकर के सबसे छोटे भाई गणेश के पैदा होने के बाद से पता नहीं क्या विरक्ति हुई कि शंकर के बाबूजी, मुरली ने घर-बार छोड़ दिया और मंदिर में ही ठिकाना जमा लिया | दिन भर वहीं, कभी गांजे तो कभी भांग के नशे में पड़े रहते  | जिस तरह भारत में साधुओं की कमी नहीं उस तरह ही उनके मानने वालो की भी कमी नहीं है | जिस खेड़े की सीमा पे वो मंदिर था वहाँ के लोग मुरली बाबा को बड़ा मानते थे | शंकर के गाँव में भी कई लोग उनके भक्त  हो गए थे | पर शंकर को यह बात बिलकुल नहीं जँचती थी | जब से मुरली घर छोड़ गया था पुरे परिवार का बोझ उसकी माँ शारदा के कंधो  पर ही था| शारदा की सास बहुत खडूस थी| खैर सास तो मिटटी की भी बुरी होती है मगर सास के साथ  ४-४ बच्चो का बोझ और उनकी पदाई-लिखाई, फिर भी शारदा ने कभी अपना मन छोटा नहीं किया | अपनी जमीन किराये पे दे दी क्यूंकि अकेले उससे खेती होने की नहीं थी| दुसरो  के खेत में मजदूरी करके शारदा ने जैसे तैसा शंकर को बड़ा किया |

शंकर ने अपने बाबूजी की तरह मंदिर का रास्ता नहीं किया | मंदिरों  से तो वो बचपन से ही बिदकता था| एक बार उसके बाबूजी ने उसे मंदिर के लिए फूल तोड़ने भेजा| फूल तोड़ने के लिए जब शंकर झाड़ियो  में घुसा तो वहाँ कोई जंगली कुत्ता सुस्ता रहा  था | जैसे ही शंकर का पैर उसकी दुम पे पड़ा उसने पलट के शंकर की जांघ में एक जोरदार बल्ला भरा| तब से शंकर मंदिर और मंदिर के कामो से दूर ही रहने लगा | बाद में बाबूजी के इस तरह परिवार को छोड़ देने से मंदिर से उसकी दूरी और बढ़ गयी | वैसे इश्वर से उसकी कोई दुश्मनी नहीं थी मगर वो खुद पर और खुद के कर्म पर ज्यादा विश्वास करता था |  धुन के पक्के इस लड़के ने अपनी तरुणावस्था में ही मन बना लिया था कि वो अपनी पुश्तैनी जमीन पर खेती करेगा | इंटर पास करने के बाद वो गाँव वापस आ गया और वहीं खेती करने लगा, शाम को वो गाँव के बनिए-महाजनों के बच्चो को पढ़ा दिया करता था |

शंकर जब घर से निकला तब उसे अंदाजा नहीं था कि आज वो क्लास नहीं ले सकेगा | “आज ग्रहण है, रात होने से पहले आ जाना ” शारदा ने कहा था उसे जब वो अपनी साइकिल लिए आँगन से बहार निकल रहा था | शारदा को मालूम था कि मना  करने से शंकर रुकने वाला नहीं | काम भी कुछ ऐसा ही था| ३ दिन पहले शंकर की सबसे दुधारो भैंस का पाड़ा  ठण्ड के मारे परलोग सिधार गया था| पाड़े की मौत का सदमा भैंस को ऐसा लगा कि उसके थन सुख गए | दुधारू पशु का अगर दूध नहीं निकालो, या दूध देते देते वो अचानक बंद कर दे तो जल्दी ही वो बीमार पड़ जाता है  यु तो जाने अनजाने सारे इलाज़ आजमा के देख चूका था अपनी भैंस पे लेकिन कुछ असर नहीं हुआ| अगर इसी तरह चलता रहा तो भैंस की जान को खतरा भी हो सकता था | अगर भैंस का सही इलाज़ नहीं हुआ तो जो महीने के महीने दूध बाँट के घर में पैसे आते है वो बंद हो जाएँगे, खेती से तो साल में सिर्फ दो ही बार कमाई होती है  | नयी  भैंस खरीदने  के लिए उसे अगली  फसल  के आने  तक  रुकना  पड़ता ,  इसी  चिंता के चलते शंकर ने आज तहसील में बने जानवरों के अस्पताल जाने का मन बना लिया था|

अस्पताल गाँव  से कुछ २०-२५  मील  दूर  तहसील में था, घर से निकलते समय शंकर ने सोचा था कि दिन ढलने  से पहले वो वापस  तो आ ही जाएगा  | साइकिल चलने में वो अव्वल  था | मगर  सरकारी  अस्पतालों  का हाल  आज जैसा है उसे देख के यह  अंदाजा तो लगाया ही जा  सकता है कि तब कैसा  होगा | वहाँ  पहुच  कर शंकर को पता  चला  कि डाक साब  तो अस्पताल का चक्कर महीने में एक-दो बार लगाते  हैं | उनके  पीछे  एक  कम्पाउण्डर  है जो वहाँ  का काम काज  देखता  है और  उस  दिन तो वो भी  अस्पताल नहीं आया था | मगर  शंकर दवा लिए बिना जाने वाला कहाँ  था | लोगो  से पूछ  के कम्पाउण्डर  को ढूँढा, फिर  उसकी बड़ी जी हजुरी करके उससे दवा ली | ये सब करते करते सूरज पश्चिम को प्रवास कर चूका था| अगर शंकर कि जगह और कोई होता तो एक बार सोचता भी, लेकिन उसको तो धुन चढ़ गयी सो चढ़ गयी | उसने सोच लिया था कि आज भैसी को दवा दे के रहेगा, उसे न रात कि फ़िक्र थी न अँधेरे की| फिर उन दिनों संचार के इतने साधन नहीं थे की शंकर रात को वहीँ रुक जाए और माँ को खबर कर दे, माँ तो चिंता करेगी ही|

 

शंकर के गाँव जाने का रास्ता बहुत टेढ़ा था,  सड़के तो उन दिनों सिर्फ शहरो में हुआ करती थी| और ऊपर से ग्रहण वाली रात |  कोई कमजोर जिगर का होता तो रुक ही जाता | मगर शंकर ने बिना सोचे अपने साइकिल उठाई और तेज़ तेज़ पैडल मरने लगा| जानवरों के अस्पताल से लग कर एक कच्ची-पक्की  सड़क जाती थी | जो आगे जा के एक पगडण्डी में बदल जाती थी | इसी पगडण्डी से होकर, खेत-बड़ियो को लांघते हुए शकर को अपने गाँव पहुचना था |

 

जब से शंकर अस्पताल से निकला था, एक कनकटा कुत्ता उसके साथ हो लिया था | शंकर ने दिन में भी इस कुत्ते को देखा था, वो दिन भर अस्पताल की पेडियो  पे सोया पड़ा था| पहले  तो शंकर को लगा कि शायद थोड़ी दूर तक आके के वापस लौट जाएगा, मगर कुकुर महोदय का  लौटने का जी ही नहीं कर रहा था | एक बार तो शंकर ने सोचा कि पलट कर इसको भगा देता हूँ, फिर उसे लगा कि मेरा कुछ बिगड़ तो नहीं रहा साथ चलता है तो चलने दो | जल्दी ही शंकर गाँव कि सीमा से बाहर आ गया, पगडण्डी छोड़ के उसको खेतो कि मेढ़ो पे से निकलना पद रहा था|  कभी साइकिल पे तो कभी साइकिल हाथ में लेके, नाले-बावड़ी पार करते  करते वो बस्ती से बहुत दूर आ पंहुचा था |  अभी तो पूर्णिमा का चाँद पुरजोर रौशनी फैला रहा था मगर बीच बीच में बादलो के टुकड़े उसे ढँक कर राहगीर के लिए मुश्किलें बढ़ा रहे थे | पोश माह चल रहा था और बादलो को देख के कहा जा सकता था कि मावठा किसी भी पल आ सकता था | ठण्ड तो पहले ही बहुत थी और खेतो में गेहूं  की फसल के लिए छोड़े गए पानी से उसका पैनापन और बढ़ गया था|

अभी खेतो की कच्ची मेढ़ो के एकदम नए रस्ते पर शंकर ने चलना शुरू ही किया था की उसकी साइकिल के पहिये गीली नर्म जमीन में धंसने लगे | शंकर ने साइकिल से उतर कर साइकिल को कंधे पर चढ़ा लिया, और गीली जमीन पार  धीरे धीरे चलने लगा | जो कुत्ता इतनी देर से शंकर के पीछे पीछे चल रहा था वो अब उसके आगे आगे हो लिया |  चाँद और बादलों की लुका छुपी के चलते रस्ते का सही अंदाजा लगाना  मुश्किल हो रहा था,  कुत्ते के आगे चलने से शंकर को एक फायदा तो हो ही गया कि अब उसे ठीक ठीक मालूम था कि कहाँ पैर रखना सही है | कुत्ता थोड़ी देर चलता और फिर जब उसे एहसास होता कि शंकर पीछे रह गया है तो वो रुक कर शकर के आने का इंतज़ार करता |  ऐसा करते करते दोनों मुसाफिर खेतों की कतार के अंत में पहुच गए | वहाँ से आगे एक खोदरा था, जो खेतों को बीच से काटता हुआ निकल रहा था | खोदरा इतना चौड़ा था कि दो बैलगाड़ियां उसमे से आराम से निकल जाए और गहरा इतना कि ऊपर के खेतों में खड़े आदमी को २ फिट दूर से यह न दिखे कि अन्दर कौन है |   इसी खोदरे के रस्ते सुबह शंकर आया था | धीरे से उस खोदरे में उतर कर शंकर ने इधर उधर देखा तो पाया की कुत्ता जो अभी तक उसके साथ चल रहा था अब नदारत है | दूर दूर तक कोई नहीं था | यहाँ वहाँ रह रह कर जुगनू चमक रहे थे और झींगुर प्रेमालाप कर रहे थे | शंकर ने सोचा जानवर है उसका क्या है, एक मन थोड़े ही रहता है | खोदरे की जमीन में पत्थरों की अधिकता थी, यहाँ नरम मिटटी नहीं थी| शंकर साइकिल पर चढ़ गया | आस्मां में बादलों के ठ्ठ के ठ्ठ आ गए थे | बादलों के पीछे से चाँद की रौशनी कुछ धुंधली और बिखरी हुई सी आ रही थी | हवा में ठण्ड बढ़ गयी थी लेकिन खोदरे के आस पास की जमीन के नीचे होने से शंकर का हवा से तो बचाव हो रहा था |  खोदरे के दोनों और खेतो के किनारों पर बबूल और नीम के पेड़, ऊपर आसमान पर पर्दा डाले हुए थे और बड़े बड़े पेड़ो का संरक्षण पा के उनके नीचे जंगली झाड़ झंकड़ उग आये थे|

 

शंकर अपनी मस्ती में मगन और थोडा उनींदा सा साइकिल पर चला जा रहा था | तभी खेत के किनारों पर  उगी हुई  झाड़ियो में उसे सरसराहट सुने दी | पहले तो उसे लगा की कोई साँप-वाँप  है | उसने पैडल तेजी से चलाना शुरू कर दिए |  सरसराहट की आवाज़ भी तेजी से आगे बढ़ने लगी | शंकर ने साइकिल धीरे कर दी, और वो जो भी था आगे निकल गया, आगे जा के झाड़ियो में कुछ जगह थी वहाँ पर वो आवाज़ रुक गयी | अब तक शंकर भी पूरी तरह रुक गया था, वो साँस थामे उसी जगह को देख रहा था जहां वो अवाजुक गयी थी| फिर से कुछ सरसराहट हुई और एक थूथन वहाँ से बाहर आया| देखते ही शंकर पहचान गया की यह तो वही कनकटा कुत्ता था जो उसके पीछे पीछे आ रहा था| शंकर ने एक गहरी सांस ली| कुत्ता खोदरे के अंदर उतर गया और शंकर से कुछ दूर ठीक उसके सामने खड़ा हो गया| वो सीधे शंकर की आँखों में देख रहा था | एक क्षण  के लिए तो शंकर  के शरीर में सिरहन दौड़ गयी, उसे लगा मानो ये मूक जानवर अब कुछ बोल पड़ेगा | शंकर इसके आगे कुछ समझ पता उससे पहले कुत्ता उसके पीछे की ओर आके खड़ा हो गया | शंकर ने इस सबको  भूलना ही बेहतर समझा और फिर से साइकिल पर पैडल मरने लगा|

 

बादलों से छन के आ रही पूर्णिमा के चाँद की मद्धिम रौशनी अब शंकर की पीठ पे पड रही थी | उसके पीछे चलने वाले कुत्ते की एक धुंदली सी परछाई शंकर को जमीन पर दिख रही थी | अब उसके मन में जल्दी से जल्दी घर पहुचने की योजना चल रही थी | यह खोदरा आगे जा कर  एक मौसमी नदी में मिल जाता था | गाँवों में हर चीज़ के अनेक उपयोग होते है | जब बरसात होती है तो यही खोदरा खेतो से पानी निकल कर नदी में पहुँचाता  था , और जब बरसात का मौसम चला जाता है तो येही खोदरा बैलगाड़ियों की आवाजाही के काम आता था | इसी प्रकार वो नदी जिसमे आगे जा कर यह जुड़ता था, बाकी मौसमो में एक सड़क का काम भी करती थी | शंकर के पास आगे जा कर दो रस्ते थे, या तो वो नदी पर कर के दूसरी तरफ की पगडण्डी से अपने गाँव जा सकता था, या फिर नदी के रस्ते सीधे अपने घर के पीछे निकल सकता था |  नदी का रास्ता छोटा था और वो सीधे उसे उसके घर तक ले जा सकता था,  मगर सूखी नदी के तल में साइकिल चलाना आसन काम नहीं है | पगडण्डी से जाने पर आसानी से साइकिल चलाई जा सकती थी| मगर लम्बा रास्ता होने के साथ साथ  पगडण्डी के रस्ते जाने में एक और परेशानी थी| वो परेशानी थी, रामकृष्ण का खेत| अपने गाँव में घुसने से पहले शंकर को रामकृष्ण के खेत से होकर गुज़ारना पड़ता | गांवे में मशहूर था कि रामकृष्ण ने अपनी जवानी में अपनी बीवी को इसी खेत पर ला कर मारा था | क्यों मारा, इसके बारे में कई बातें मशहूर थी, जितने मुंह  उतनी बातें| और इस सब के साथ यह भी मशहूर था कि उसी खेत में रात को रामू की बीवी की आत्मा भटकती है| रामू अब पागल हो चूका था, लोगो का कहना था यह भी उसकी बीवी की आत्मा का कमाल था|  जो भी हो अब रामू का खेत बंजर था और गाँव के बड़े से बड़े बाहुबली की हिम्मत नहीं थी कि वो रामू के खेत पर कब्ज़ा कर ले| शंकर के सामने दुविधा थी कि वो जाए तो किस रस्ते से जाए|

 

यही सोचते सोचते शंकर खोदरे के मुहाने तक आ गया, अंततः उसने पगडण्डी के रस्ते जाने का मन बना ही लिया | उसे किसी भूत वूत का डर नहीं था, बस वो नदी के  पथरीली तल पर साइकिल नहीं चलाना चाहता था | शंकर नदी पार करने लगा, कनकटा कुत्ता अभी भी उसके पीछे पीछे चल रहा था |  उसकी धुंधली परछाई अभी भी शंकर को जमीन पर दिख रही थी| नदी के तल में माहौल आस पास से शांत था | यहाँ झींगुरो की आवाज़ और  जुगनुओ की रौशनी नहीं थी|

 

शंकर अब यह सोच रहा था की जल्दी से जल्दी घर पहुँच जाए, माँ उसकी राह देख रही होगी| नदी के पथरीले तल पर साइकिल चलाना आसान नहीं था| फिर भी शंकर पुरे जोर से पैडल चला रहा था| अचानक वो कनकटा कुत्ता दौड़ते हुए उससे आगे निकल गया| आगे जा कर नदी में एक मोड़ था, वो कुत्ते उस मोड़ के बाद शंकर की दृष्टीसे ओझल हो गया| यह दूसरी बार था जब इस तरह कुत्ता, उसके अलग भाग निकला था| शंकर ने ज्यादा ध्यान न देते हुए अपने रस्ते चलते रहना ठीक समझा| जैसे ही शंकर ने नदी के साथ-साथ मोड़ लिया, उसे कुत्ता आगे खड़ा हुआ दिखा| कुत्ता ठीक उसी अंदाज़ में खड़ा था जैसा वो पिछली बार खड़ा था, उसकी आँखें शंकर को एकटक देख रही थी| शंकर को फिर लगा कि वो कुछ बोलेगा| शंकर अपनी गति से उसकी ओर बढ़ा| जैसे ही शंकर उसके पास पंहुचा, कुछ ऐसा हुआ जो देख कर शंकर के पैर जम गए| एक क्षण के लिए उसकी सांस रुक गयी ओर उसका मुंह फटा का फटा रह गया| उसने साफ़-साफ़ देखा कि उस कुत्ते ने शंकर से कुछ कहा| ठिठक कर रुके शंकर के मुंह से अनायास ही “क्या?” निकल पड़ा|
कुत्ते ने उस प्रश्न का उत्तर भी दिया| “इस रस्ते से मत जा| नहीं बचेगा” वो बोला|

शंकर को काटो तो खून नहीं, शरीर पर जैसे उसका अधिकार छीन लिया गया हो| आंखे फाड़े वो कुत्ते को देखता ही रहा, फिर उसके पैर कांपने लगे ओर साइकिल से वो गिर पड़ा| जब तक वो कुत्ता वहाँ से भाग चूका था| शंकर वहाँ पड़ा हुआ था, वो होश में तो था पर उसका दिमाग अचेत हो चूका था| कुछ लम्बी सांसे लेने के बाद जब उसके होश ठिकाने आये तो उसने पुनर्विचार किया| उसे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था कि कुछ ऐसा हो सकता है| उसने पढ़ा था कि कई बार अधिक थक जाने पर इस तरह के छलावे होते हैं| जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था, उसका इस वाकये पर यकीन कम होते जा रहा था| जल्द ही उसने इसे भूल कर आगे बढ़ने का मन बना लिया था, वो था तो बड़ा हिम्मती| मगर जो कुछ हुआ उसने थोड़ी देर के लिए उसकी हिम्मत को डिगा दिया था, उसके दिल में कहीं न कहीं एक भय घर कर गया था|

 

अभी भी नदी के तल में साइकिल चलते हुए वो यही सोच रहा था कि वो कुत्ता आखिर उसके साथ क्यों आया, ओर आखिर उसने उसे ऐसे बोला क्यों| अँधेरा और बढ़ गया था| कुछ देर पहले तक जो चाँद अपनी दुधिया रौशनी से नहला कर बादलो को कपास के फोए की तरह बना रहा था, अब उसकी रौशनी मद्धम पड़ने लगी थी| ग्रहण शुरू हो रहा था| रातों का अपना अलग जीवन होता है| झींगुर, जुगनू, गिरगिट, गीदड़, लोमड, चूहे जैसे कई जीव जो दिन में अपने-अपने ठिकानो में चुप जाते है, वो रात में खाने की तलाश में निकल आते है| इन सब में सबसे अजीब और घिनोना प्राणी होता है लकडबग्घा| मुख्यतः मरे हुए जानवरों के शवो से अपना भोजन जुटाने वाला यह जीव एक बेहद ही ख़तरनाक आवाज़ करता है| जो कई मील दूर तक सुनाई पड़ती है| कमज़ोर दिल वाले तो बस उससे ही डर जाते है| और अगर यह किसी के सामने आ गया तो, इसका अजीब रूप देख कर तो होश उड़ जाना पक्का है| आगे पैर पिछले पैरो कुछ बड़े होते है और गर्दन से लेकर पीठ पर घोड़े की तरह बाल|

रह-रह कर शंकर को लक्कड़बग्घों के रोने की भयावह आवाज़ शंकर के कानो में पद रही थी| जैसे जैसे वो आगे बढ़ रहा था, यह आवाज़ तेज़ और तेज़ होती जा रही थी| उसने अपने आप को लक्कड़बग्घों से सामने के लिए मानसिक रूप से तैयार कर रखा था| चाँद कि घटती रौशनी के साथ ही, रात कि आवाज़ें और तेज़ हो गयी थी| दूर कहीं, शंकर को कुछ आकृतियाँ चलती हुई दिखी, जिस तरह से वो चल रही थी, लग रहा था कोई जानवर ही है| चमगादड़ो का एक छोटा सा झुण्ड शकर के उप्पर से उड़ कर गया, एक चमगादड़ तो शंकर से बस बाल भर की दुरी से निकला| पास पहुचते हुए शंकर को यह साफ़ हो गया कि वो आकृतियाँ लक्कड़बग्घों की थी|
कहीं से उन्हें मारा हुआ कोई जानवर मिल गया था, जिसको वो चीथड़े-चीथड़े कर खा रहे थे| शंकर की साइकिल की आवाज़े सुनते ही वो सतर्क हो गए| वो रुक कर शंकर की ओर देखने लगे| शंकर ने तो पहले से ही इस सामने के लिए खुद को तैयार कर रखा था| वो बिना रुके उनकी ओर बढ़ रहा था| कुछ देर शंकर को देख कर लक्कड़बग्घों को समझ आ गया था कि शंकर रुकने वाला नहीं था| यह समझते ही उन्होंने वहाँ से भागने में ही भलाई समझी| अजीब से, किसी पागल के हंसने के सामान आवाज़ करते हुए, वो वहाँ से भाग निकले|

शंकर उन पर ध्यान न देते हुए आगे बढ़ना चाह रहा था, मगर  के कोने से उसको कुछ ऐसा दिखा कि वह ठिठक गया। जिस जानवर को वो लक्कड्बग्घे नोच नोच कर खा रहे थे वो वही कनकटा कुत्ता था। पहले तो शंकर को विश्वास नहीं हुआ, क्यूकि कुत्ता तो  उलटी दिशा में गया था। और तो और उसने लक्कड्बग्घो और कुत्ते के बीच किसी संघर्ष की आवाज़ भी नहीं सुनी। लेकिन उस क्षत-विक्षत शव का सर, जो एक बाबुल के पेड़ के नीचे पड़ा था, उस सर का भी कान ठीक उसी तरह कटा हुआ था जैसा की उस कुत्ते का था । शंकर की साँसों की गति तेज़ हो गयी थी। उसका ह्रदय जो बड़ी बड़ी मुश्किलों को झेल गया था, अब थोडा डिगने लगा था। वो मूर्ति के सामान खड़ा हो कर उस शव को देख रहा था, कि अचानक कही दूर कोई उल्लू बोलने लगा। उल्लू की इस ध्वनि ने शंकर की धुन को तोड़ दिया। शंकर ने पाया कि उसका कुरता पसीने में पूरी तरह भीग गया था। हवा तो अब पहले से भी ठंडी चल रही थी, लेकिन शंकर के सर से तो किसी बरसाती झरने की तरह पसीना चू रहा था। ग्रहण अब अपने चरम पर था, सोमदेव रहू के पाश में करीब करीब कैद हो ही चुके थे।

ग्रहण का सम्बन्ध भारतीय मान्यताओं में कभी भी सुखद कहानियो से नहीं रहा है। आज भी कई घरो में ग्रहण छुट जाने के बाद शुध्दिकरण की क्रियाएँ संपन्न की जाती है। मगर शंकर नए विचारो वाले भारत का नागरिक था, ऐसी पुरातनपंथी मान्यताएँ उसको मंज़ूर नहीं थी। यह रात उसके इन विचारों की परीक्षा की रात थी। पार्श्व से निरंतर एक ताल में आती उल्लू की आवाज़ अब अँधेरी हो चली रात को एक स्थायित्व प्रदान कर रही थी। आसमान में बादलों  के पीछे के उस सफ़ेद गोले को पृथ्वी की परछाई ने पूरी तरह ढँक लिया था। रात का तीसरा  पहर शुरू हो रहा था। भूत प्रेत के किस्से सुनाने वाले लोगो को इसी पहर में सबसे ज्यादा पारलोकिक अनुभव होते है, क्यूंकि इस पहर में  ही रात सबसे गहरी होती है।

 शंकर के पेर साइकिल पर लगातार एक मशीन की भाँति चल रहे थे। उसने अपने अन्दर की सारी उर्जा, साड़ी शक्ति और साड़ी हिम्मत को इकठ्ठा कर अब बिना किसी पथांतर एक लक्ष्य की और बढ़ने की ठान ली थी। अँधेरी रात में खुद ही के भरोसे यह नौजवान आगे और आगे बढ़ता ही जा रहा था। उसका शरीर पैडल चलने की एक लय में आ चूका था। साइकिल के चैन कवर से रगते हुए पेडल आवाज़ एक नियमित ताल में आ रही थी। पहले से आ रही उल्लू की आवाज़ अब दूर और दूर होती जा रही थी। शंकर को महसूस होने लगा कि अब शायद कुछ विचित्र, कुछ अजीब नहीं होगा। लेकिन शायद भाग्य को ऐसा मंज़ूर नहीं था, अगला पैडल मरते ही शंकर की साइकिल की चैन उतर गयी और उसने अपना संतुलन खो दिया। वो पगडण्डी के किनारे वाले खेत में जा गिरा। और उसके दुर्भाग्य को शायद सिर्फ इतने से संतोष नहीं हुआ, कि आसमान में एकत्रित मेघों ने वर्षा का सूत्रपात कर दिया।

एक पल को तो शंकर झुंझला ही गया, उसे लगा कि वो क्या कर जाए। शायद इससे बुरी रात उसके जीवन में पहले कभी नहीं आई थी। धरा पर बरसती पानी की बूंदों के शोर ने आस पास की सारी आवाजों पर एक पर्दा सा दाल दिया। शंकर कीचड से भरी उस ज़मीन पर खड़ा अपने खोये दिशा ज्ञान को पुनः स्थापित करने की कोशिश करने लगा। उसे तो यह भी पता नहीं था कि उसकी साइकिल कहाँ पर गिरी थी। बारिश के साथ तेज़ हवा भी चलने लगी, अब शंकर के सामने समस्या यह थी कि ऐसी बारिश में वही रुक रहे या आगे बढ़ने का जोखिम उठाये। रुके रहना तो उसे वैसे भी मंज़ूर नहीं था, तो उसने अंदाज़े से साइकिल दूंदने की कोशिश शुरू कर दी। काफी देर कीचढ़ में टटोलने के बाद साइकिल का पहिया उसके हाथ में आया। उसने अँधेरे में ही साइकिल की चैन वापस चढ़ाई और उसपर सवार हो गया। पगडण्डी पर कीचड तो काफी हो गया था, अब शंकर को पहले से कंही अधिक जोर लगाना पड़ रहा था। उसकी गति मंथर हो चली थी। शंकर अब अपने हर उस फैसले को कोस रहा था जिसके चलते वो इस वक़्त इस हाल में था। तभी उसको वो वाकया याद आया, जब उस कनकटे कुत्ते ने उसे इस रास्ते जाने से मन किया था। उस बात को तो शंकर एक भ्रम मान कर भुला चूका था, लेकिन शायद उसी भ्रम ने शंकर को एक चेतावनी जरूर दी थी।

बारिश अब थोड़ी थम सी गयी थी। और शंकर की ख़ुशी का तब ठिकाना नहीं रहा, जब उसने दूर एक लालटेन जलती हुई देखी। उसी पल शकर ने निर्णय कर लिया कि जैसे भी हो हाथ पैर जोड़ कर आज रात वो यही आसरा ले लेगा। उसने साइकिल रौशनी की दिशा में मोड़ दी।

“भाई कोई है?” शंकर ने पूछा

जहाँ  लालटेन तंगी थी वही एक पुरानी झोपडी थी, जो एक खाली खेत के बीचोबीच बनी हुई थी। अन्दर से हल्का-हल्का धुँआ भी उठ रहा था। कुछ देर रुकने पर भी जब किसी का जवाब नहीं आया तो शंकर दुबारा आवाज़ लगाई। लेकिन परिणाम वही रहा। शंकर ने दरवाज़े को जब हलके से धक्का दिया तो दरवाज़ा खुल गया। अन्दर कोई नहीं था, बस एक छोटा सा दीपक चूल्हे के पास जल रहा था। चूहे पर एक बर्तन रखा था और नीचे एक थाली में दो रोटी। भूख तो शंकर को बड़े जोरो की लगी थी। और सामने थाल सजा था, मगर उसका शिष्टाचार उसे इस बात की इजाज़त नहीं दे रहा था कि वो किसी के घर में घुस कर बिना पूछे कुछ खा ले।

शंकर चूल्हे के नज़दीक झोपडी के उस गर्म कोने में बैठ गया। दिन भर की भागदौड़ और रात की घटनाओ से उसका शरीर और मन दोनों थक चुके थे। उसने अपने कुर्ते की जेब में हाथ डाल कर भैंस की दावा की शीशी का होना सुनिश्चित किया। यही वो चीज़ थी जिसके लिए उसने सारी  मुसिबत  मोल ली थी। उसने खुद को दिलासा दिया कि अगर वो सुबह सूर्योदय के साथ ही निकल पड़ता है तो सुबह के चारे के साथ वो भैंस को दावा खिला सकता है। इसी  उधेड़बुन में उसे नींद कब लग गयी उसे पता भी नहीं चला।  शायद शंकर के लिए इस रात का सबसे सुहाना पल वही था।

…शेष अगले भाग में/To be continued

Weekend Engagement

Weekend, what can you do in a weekend? There can be a million answers for this question. Lots of people would have done lots of prolific things during the span of the two days that we call a weekend. I am going to tell you a story of one such weekend.

Friday, 23rd April 2010 6:15 PM

I am sitting in the office cafeteria at my office in Pune with two of my colleagues, Sakshi and Poulomi. We are having snacks and I tell them I have to catch a bus at 7:30.

Sakshi : How are you supposed to reach ruby hall by 7:30? (She asked this because of the distance I had to go to catch the bus from Ruby Hall)

Me: By auto… (Gesturing the handle of an autorikshaw). I have done that in past, last time I started at 5:30 to catch a bus at 6:30.

Sakshi : You see, there is a difference between 5:30 and 6:30. You will see.

Me : I am done with the sandwich.

Sakshi : I think you should leave.

Me : Bye… (half walking half running)

I get out of the office, catch the first shared auto to reach the Hinjewadi chowk. It takes me 10 mins and 10,000 words to convince a rickshaw driver to drop me at the bus stop for mere (!) price of Rs. 280. This comes with an added condition; he will also take up fares all along the way.

During the whole journey he keeps screaming ‘Teshon’ (‘Station’ in local lingo). Thanks to him we stop at atleast 5 places on the way and I get accompanied by a fat and stout Girl going to meet her boyfriend, a cool and sexy girl who is going for a movie and an insurance agent going for a call. Now don’t ask how I came to know about what they were going for.

I reach the bus stop and manage to catch the last bus leaving for Indore. As I am so late to get the ticket the only seat left was the upper berth at the end of the bus. Those who are not familiar with the sleeper buses that ply in all parts of India don’t get surprised by the mention of the word ‘berth’. The sleeper buses are an amalgamation of the Chassis of a bus and the layout of a train. Search Google for picture of these buses, which will give you a visual feel of the interior.

Travelling with your berth at the rear end of bus is what you call pain in ass, head, back …actually each and every part of your body. The ride is so bumpy that during the sleep (whatever I was able to get) I dream of travelling on moon. I bang my head atleast twelve times after which I stop counting.  At an early hour of morning my cellular communication device informs me of a text message. It says

‘Dear Customer, your outgoing facility has been barred due to negative verification of your documents. Please submit correct documents to continue uninterrupted service.’

Now that’s what you call an insult to injury.

Saturday, 24th  April 2010 9:00 AM

With very little sleep and lots of body ache I manage to reach Indore. As usual the city that I love the most welcomes me with a shower of dust and blow of hot air. I see development work going on all along the way to my place. As I reach home, Mommy – Papa and Anand Mama (Chunnu Mama) are waiting anxiously for me. They think my phone died due to low battery.  A plate of Poha is served in front of me along with a glass of Pana (Green mango squash). Man! I love Indore. As always a plate of Poha is never enough for an Indori.

Chunnu Mama is in Indore as he had to leave for some remote place near Mandla for a training camp for 15 days. The place is so far flanged that he has to walk 1.5 kms and climb a hillock to make a phone call.  (He is still there as I write this).

All during the day I complete various important jobs pending to be done. I present you the list

–        Visit to doctor, as a part of my monthly check up.

–        Get my glasses repaired, which got damaged in my back-of-the-bus journey.

–        Catch up on lost sleep.

–        Lunch

–        Visit to a friend’s place to collect a parcel which I was supposed to deliver to him in Pune

–        Visit to Bhua’s place

–        Then paid a visit to one of my cousin who had recently run into a 75 yr old man. The old guy was now in coma, had broken both his knees and my cousin was held responsible for this. (I never felt so as the old guy was driving a Royal Enfield Bullet and my cousin a TVS Scooty. How can a boy on scooty injure a man on Bullet so lethally).

–        Book a ticket for return journey to Pune.

Meanwhile these things are happening I am constantly planning with my friends for the next day. Sunday is going to be the biggest day in life of one of my friend, Ashish Sharma aka Mathura aka Bhata aka Haapshish aka …..(Sorry cannot produce the whole list; it is bigger than the bible).

He is getting engaged after all.

Sunday, 25th April 2010 5:30 AM

I wake up listening to the alarm. I had to get ready by 6:00 AM as Nilesh sir is going to arrive and we would start for our journey.

Nilesh Sir

Nilesh Singh Chandel, he was our senior in engineering college. ‘Berang’ , ‘Bindass’ and ‘Berang Bindass’ are his word whiskers, but with some meaning attached to them. I have provided the possible meaning for them.

Word Meaning
Berang Literal meaning – Without any colour.He uses it when he intends to say that a particular job was done without any fear. It is more like the just-do-it.
Bindass Literal meaning – Without any inhibitionsHe uses it to denote the carefree nature of things
Berang Bindass He uses it to denote the combination of above two characteristics.

Although a senior of ours he became quite a close friend in the later part of our college years. The bond was strengthened by the mutual exchange of favours among us, especially with Ashish. On Saturday we had decided to go to Sihore for Ashish’s engagement on his bike as I had come back to catch a bus at 7:00 PM for Pune.

While I am bathing, I could hear that Nilesh sir has arrived and is talking to my Mom. I quickly come out and get dressed up. It was 6:30 by the time we leave. We refuel the bike at a petrol station just near the city limits before hitting the highway.

The road from Indore to Bhopal (On which falls the town of Sihore, at a distance of 160 Kms from Indore) is named State Highway 18. Now in the part of world where I live, even national highways are not expected to be in a very good condition, leave alone the state highway. But what we come across was much more than a surprise. The road is unexpectedly smooth and broad. The median is as wide as the roads and there are trees all along the way. We are so taken aback by the quality of the road present in front of us that we go almost a kilometer before we realized we are on the wrong way, near Dewas. At this point we check our phones for the time elapsed (as none of us had watches), it is already 7:45 and we are supposed to reach Sihore at 9 o’clock. We have to travel  116 kms in less than 90 mins. Now that is impossible we both know.

None of us spoke a word for the next one hour which we took to reach Astha, a town 40 kms from Sihore. We had to have a stop here because our bums are so hurting that I start believing that I would not be able to return by same means. A refreshing cup of tea and a plate of Poha brings back life into us. It is still cool and sun is not up to its full glory. We gear up for the last leg of our travel.  All through the journey it never happens that due to the quality of the road we had to shift to a lower gear.

Sunday, 25th April 2010 9:30 AM

At 9:30 we reach the venue, as soon as we entered the marriage garden where the engagement is supposed to happen, an SUV also enters with us. Out come four boys, Aanil Pandey, Davendra Raikwar, Vaibhav Gupta, Vipul Gupta.

Aanil Pandey

Anil Pandey, he is Ashish’s school  friend. His voice is so heavy that a you could crush a can of cola under it. Presently in Delhi he is famous among the friends as ‘the confiscator’. He gets hold of whatever belonging he likes of his friends and is reluctant to return that. He is also famous for his love for black coloured clothing.  Ashish attributes his mischievous nature most to Aanil, who influced Ashish a lot in their school days. Pandey now seems to be grown old as considerable amount of his hair is grey and he has grown thin.

Davendra Raikwar

Davendra Raikwar, He is among the people on whom I can go about writing a book. But will wind it up in short. Anna, is how we address him. He has absolutely unpredictable temper. He can make anybody go mad with his annoyance if he wills. One of my favorite partner when it comes to nag somebody. Both of us combined have produced many disastrous incidents where people got very hurt, which can be recalled by lots of our friends (angry friends, rather). He is very parsimonious when it comes to talking and keeps most of things to himself.  Presently working for Delhi Metro, he holds the most prestigious job among us, as majority of us are software engineers. You need to be his friend for a long time before you understand what he really means when he remains quite. During our college times he used to hate the silly text messages on friendship, love and etc. But now he is the one who sends all such messages and the one who sends them the most.

Vaibhav Gupta

Vaibhav Gupta, again a figure who can be a subject of a book. He is the favorite prey for Davendra and me and he also very well appreciates this. Kaka is how somebody from us will address him. The reason behind this is that he used to play the role of famous ‘Ramu kaka’ from Sholay in the skits we staged during our college. He is also known as ‘the altruist’ due to his helping nature. Very few people know that he lives a dual life. For those who see him from a distance don’t know this. And even no one from us know exactly what his other life is like but all of us know discrete bits and pieces. Below is the list of certain things that define him.

  1. Loves listening to songs.
  2. You will find him always chewing cinnamons.
  3. When it rains it is out of his control to not get drenched.
  4. He cannot help helping others, especially if the other is a girl.
  5. Needs Dal-baati at least once a week.
  6. Loves philosophies of Osho, Sri Sri Ravishankar and anybody who can profess.
  7. Visit places with only some of his selected friends, especially by bunking classes.
  8. Occasionally sleeps at night.

Presently at IIT Roorke, I hear that he had created a fan base there with his altruism and stories he narrates to everybody. I think that is enough to give an idea about him.

Vipul Gupta

Vipul Gupta, Vaibhav’s younger brother. If I consider all the siblings of my friends he is the one we are friendliest with. Our relationships with him have reached such a level that Vaibhav doesn’t matter when it comes to rapport between any of us and Vipul. Monu, as he is fondly called, is a humble and happy-go-lucky creature. Although I have heard incidents of his stubbornness from his mother but I have just heard them. He always comes across smiling. He is always ready on his toes to respond to orders of his elder brother. A Charted Accountant in making he is a dream of a brother.

Before me and Nilesh sir finish catching up with these four guys, Ashish, Pavan, Deepak and Anil Upadhyay along with some other friends of Ashish come to us.

Ashish Sharma

Ashish Sharma, already you all are aware of his various names. The most popular and catchy one is Mathura. Now I am not going to tell you about the story behind this name. Mathura, as everybody calls him is a weird character. An ardent gym devotee, he always believes in doing what he wills. He can talk to a stranger for a whole day, till the stranger is no more a stranger. He loves photography but only if the one who is posing is he. He can sleep for days and remain awake for more days. When we were in college he was a terror among the juniors and was the most dedicated junior to all the seniors. Pavan Rungrecha holds the key to Ashish. Nobody save Pavan came make Ashish agree to certain point. One more striking aspect about Ashish is his Bike. A black Yahama Libero is the one possessed by him. He is famous (or rather infamous) for his trademark U-Turns on a busy road. He has achieved various accomplishments with his bike, the latest and the most daring one is a bike ride from Ujjain to Mumbai (nearly 700 Kms) in 16 hours. Now I won’t go boasting about him. He is the one getting engaged and we all have travelled from different parts of the country for him. As I have mentioned earlier about some of my friends on whom I can go about writing a book, the book on Ashish would be the most massive one. Presently, he works for a software company in Mumbai.

Pavan Rungrecha

Pavan Rungrecha, a plump shaped, preoccupied, self conscious guy who wants to look fit without any effort. Genda aka mama aka pakoda … he too, just like Ashish has wide variety of names. He is always bothered about his appearance. During the college time he used to get smitten by every passing girl. He very skillfully pretends to be the most responsible, the most mature and the most thoughtful guy among us, and is very successful in doing so (although we know the truth). If you tell him the symptoms of a disease he is sure to catch that within few hours. He thinks he is the leader of all the mankind and is the one who should speak on everybody’s behalf. Now I should refrain from writing much about him as it will be harmful for him as well as me. Presntly, just like me he is working for a Software company in Mumbai

Deepak Sisodiya

Deepak Sisodiya, a smart looking guy (he just looks smart) from Mandsaur (along with Pavan and Davendra). Pavan calls him Lala and so do some of us. He always keeps smiling and laughs out loud at every joke. You never know when he actually understands the joke and when it’s a dumb laugh. He is one of the few people who actually enjoy listening to incidents narrated by me(this is what he tells).  Apart from Davendra he is the one who sends a message per day. But his are more comic rather than dull sentimental messages. Presently he handles his family run business and manages a sari shop.

Anil Upadhyay

Anil Upadhyay, another character who hails from Ujjain and is Ashish’s childhood friend. He is one of the most astonishing characters I have ever seen. Some of his deeds are so prolific that if I cannot think of doing those. His friends fondly recall his famous suicide attempt. During the college time he seldom prepared for the exams but often passed the exams. Sometimes we knew how he did that and sometimes not. He was managing all the activities for Ashish’s engagement.   Presently he teaches in an Engineering college.

Ashish: BAWA, BAWA, BAWA, BAWA, BAWA, BAWA, BAWA!!! (That’s our trademark greeting. Bawa pronounced loudly 7 times in a rhythm, with your hands up like you are held by a cop. We even have a community for that on Okut!) Abe to bike se kaise aa gaya? (He asks to me).

Me: Kyun, main bike se nahi aa sakta? Koi problem hai kya bikes ko?

Ashish: Nahi be, main is liye aisa pooch raha hoon ki tu itni der bike pe baitha kaise?

Me: Ab teri sagai me aana tha to tere tarike se hi aa gaya….

Soon Naushad, Amit, Pravin and Ritu (Sharma) arrive. Everybody is talking to each other.

Naushad Ghori

Naushad Ghori, tall, fair and handsome (argh…) male (?). I don’t know it is his habit or he does that intentionally but he can never be serious. Back in college he was an integral part of our team that staged skits in which we spoofed the Hindi film industry. And it was during the times of cultural activities that the two of us interacted the most. He used to play Sanjeev Kumar aka Thakur Baldev Singh from Sholay and Vaibhav Gupta was Ramu kaka (Hence he came to be known as kaka). He is one of the most irritating creature I have come across, there were times when during the rehearsals I used to shout like anything at him and Shikar (I won’t describe this creature here). He always tries to impress girls with his greasy talks. Every time you will find him loitering around girls. During our training days in Kerala he still remained the femalephillic organism. We both were put in the same group for preparing a mock project.  There were instances where he did something which could be called as productive for the mock project, but those are very few. I feel I have wasted enough space on this good-for-nothing rascal.

Amit Hasija

Amit Hasija, slim, tall, fair brown-eyed guy. Amongst all these people he is the one whom I had known for the longest. Both of us went to the same coaching class in high school. He and Naushad are schoolmates. Ashish, Amit and Naushad are flatmates. Ashish, Naushad and me are classmates from college. It is interesting to see how the net of friends interconnects two nodes through different paths. So coming back to Amit. To be honest, during our college times I had minimal interaction with Amit. It was only during our training days in Kerala that we got to spend some time together. He used to come and stay at the hotel in which we were staying, even though he was allotted a different accommodation (God knows why).  Presently he is working for the same IT firm as I am and lives in Mumbai.

Praveen Kaushal

Praveen Kaushale aka chupchap, a dark, reserved guy. He also is one of the flatmates of Ashish. He and I used to travel in the same bus during our college times. There is an interesting story about how he came to be known as Chupchap. Once when we were in second year of college there was an event organized by a local newspaper in our college. Somebody from Praveen’s branch knew one of the reporters. They decided to do one piece for the local supplement of the paper where senseless bits of information and meaningless college news are published (Usually the last page on the city supplement). In that article a picture of group of friends was published (Praveen was also a part of it) and there was a small description of every member in it. Praveen was named as chupchap by his other friends and it was written ‘ab mileye Praveen se jinko inke dost pyaar se chupchap bulate hai….’  And some other shit. Next morning he came out in the bus flaunting that his picture has been published in the paper. When Abhishek (another of my friend) and I read out the matter we couldn’t help needling Praveen. It was so hackneyed and so chutiyatic (sorry for the slang). Even Praveen was embarrassed with that, he never mentioned that article again. Presently he is chupchaply living in Mumbai and exploring new boundaries.

Ritu Sharma

Ritu Sharma, a cute, lovable and what-is-happening sort of girl. Hers was roll number 48 just before mine. She has been the victim of my wrath during the practical session in the college. I was always concerned with finishing the experiment as early as possible and she and Ritu Kapse were the two other member in our practical group. I used to tell them to sit quietly and not utter a word till I have done the practical. It was only after I had finished that they touched the apparatus. Presently she is teaching at an engineering college. When I asked her what subjects are you teaching she replied that, who actually teaches at an engineering college, with a chirp.

And our talks continue till we go into bath. The bathroom doors has slits on the top. Somebody starts taking pictures of the ones bathing inside and that turns into rage with each one bullying another. Now I am not going to describe the intricate details of it. After getting ready we sit below a tree which is very soothing as heat starts mounting. While we were bathing Sandhya(Ashish’s fiancé) had  arrived.  Soon two other creatures had arrived namely Kapil Saluja and Banakdeep Singh Saluja

Kapil Saluja

Kapil Saluja, a smart, young and stubborn guy. He is the younger brother of our dear friend Rishi. As Rishi is in Chandigarh and could not come to attend Ashish’s engagement Kapil came. He would’ve come even if Rishi was there. Kapil considers Ashish as his guru. Both share traits as far as thinking goes. He is also famous for his stubborn nature. I had heard incidents of his beating up a policeman even before I first met him. Presently he is studying in Indore.

Banakdeep Singh Saluja

Banakdeep Singh Saluja, a slim, fair Sikh with genuine turban. He is Kapil’s friend and flatmate. I have met him only on certain instances but the impression I got about his is he is an amiable and cool tempered person. It was during Ashish’s engagement that I came to know about the meaning of his name, Banak means Honey. Although we had a very less interaction there have memorable incidents one of them being his bike being taken away by traffic police. At that time he had even lost all the papers for the bike and his license too. He is also presently studying along with Kapil.

The ritual requires the presence of the girl for most of the time. Hence we are with Ashish in a room where he was getting ready while the rituals are being performed. He will only have to make a presence for exchanging the rings and some trivial rituals. But that is also delayed as he had forgotten a special tika that is worn by the Boy at the time of engagement (Anil Upadhyay is held responsible for this). Two of his friends are dispatched to bring that from the local market. As they aren’t aware of where to get it from, it takes them time to find it out. Meanwhile, everybody starts thinking that we have held up Ashish as a sign of the groom’s ego. People from family keep saying that it is not a marriage let him go, and we have to explain them the real problem.

Just before the auspicious time is about to pass, they arrive with the tika and out comes Ashish dressed in Purplish blue Kurta payjama.  He goes straight to where Sandhya was sitting and also the priest. All through this time, Pavan is taking snaps of the happenings. He thinks he is some world class photographer and expects us to feel privileged to get his services.

It is very crowded as everyone wanted to see the exchange of rings. Davendra, Deepak and me slip back and as soon as ceremony is over we signaled the Dholi(Drummer) to start his act(actually he was already into it) and then we start dancing. For next 10 minutes what happens I don’t know. It is so hot and the dancing resulted in sweating and perspiration. I am dehydrated; I go and drink from whiSchever water body comes to me at first. Despite of doctor’s warnings of drinking only distilled water I gulp 4 glasses of water from a drum kept just outside the hall where we were dancing.

After all this we take time to calm ourselves and retire to the same tree. As many of us meet each other after a long, long time we couldn’t get enough of catching up. Naushad, has a bleeding nose due to the heat. Poor guy couldn’t enjoy the whole function. Soon the lunch is served and we the groom’s friends with the entire attitude enjoy the first serving.

Sunday, 25th April 2010 2:30 PM

After lunch we go back to our temporary lounge(The tree shade) and keep chatting. Nilesh Sir points out that it was nearing 2:30 the time we had decided to leave SIhore. We start bidding goodbye to all and it is not before 3:15 that we could actually leave.

This time the heat is on. We cover ourselves with white cotton cloths one of which I had brought with me and one each was given from Sandhya’s family as an acknowledgement of appearance in the function to us. We are now aware of the route and the time we would take to get back hence we are more confident. But certainly the conditions are different, it is almost 41o C and the highway is going to be hotter than this.

Nilesh sir rides the bike for the first leg of 60 Kms till the MP Tourism highway retreat. Then I take over and it is never a time in the journey that we have to pull down the speed due to the poor quality of the road. It takes us just within 3 hours to reach my place. We cover more than 160 Kms in 3 hours.

Sunday, 25th April 2010 6:15 PM

I reach home, took a bath while mommy prepares a cup of tea. I realize that I am having a headache. Papa gives me a painkiller. I quickly pack my bags and leave for the bus stop. When I reach the bus stop, the bus is already there.

Before I could arrange my belongings the bus has left the limits of the city. And here I am wondering about this adventurous weekend that I had. If I see it in retrospect I could’ve never agreed to the idea of riding a bike all the way to Sihore and coming back in one day. But sometimes you do most unusual things for the people whom you love. At no cost I could’ve missed Ashish’s engagement. At no cost I could’ve missed meeting so many friends at one place. Soon I fall asleep.

Monday, 26th April 2010 12:00 PM

I am sitting in my office and it seems as if nothing has happened. Although I have travelled more than 1700 kms by road in just a span of 2 days including 320 kms on bike in one day it makes no difference. I have loads of calls and issues. The usual life has resumed……

Love or Death – Part 4

We ran for about 10 minutes, but we never seemed to find our way back. The bells were now silent and we were exhausted. She had a mysterious smile on her face. “I told you we’ll have to stay here if we don’t catch this boat.” I explained in panic. “So let’s stay here. We’ll get back tomorrow morning.” She said with ease. “Well we don’t have any arrangement for shelter and do you know how cold it is going to get in the night.” I was irritated with her attitude. I knew how cold it would be. This was an island and due to the water all around us the wind gets colder than the mainland.
Finally we got out of the forest and the temple stood in front of us. I ran towards the river but the boat was long gone. I was agitated. Now what stood in front of me was the sight of a distant village where smoke rose from various houses, most of them lit by a single light bulbs. These were the homes of the poor fishermen. The reflection of the village in the river created a magical scene. I stood there; it looked like a huge painting of a brilliant painter.

“How beautiful it is.” She said. She was climbing down the slope. The atmosphere was so calm and peaceful, that all my panic and anger was gone. The wind blew through my hair. It was truly divine. The fishermen were moving in and out of their houses on the other side. They were involved in their daily works. We, on the other side of the river stood secluded from the outer world. There was no light on the island so they could not see us, but we could see them. It made me feel that how far we have come from this world yet how close we are to it. I turned to her “thank you.” I said. I realised that if it would not have been her we would have gone back.
The river was calm and placid. It reminded me of her eyes. As I looked into them I fond them to be a bit more damp then the usual. The water in her eyes moved and a small tear rolled onto her cheek. She ran towards me; I hugged her. It was soothing; it felt very light. I felt like…. My brain went dead I had no thoughts. There were just she and I. We stayed there for a while.

*******

“You asked me, ‘do I love you?’. I don’t know much about love but if this feeling that both of us share is love. Then yes I do love you.” I told her as we moved towards the temple complex. We decided to spend the night inside the temple near the altar. There were still some embers left in it, so it would provide some warmth. We lied on the temple floor and kept talking.
“You know when I was a kid, I was afraid to come to Bet after sunset. There were stories about ghosts roaming here.” We decided to restrain ourselves from any philosophical discussions. “Really? But we are in a temple now. I don’t think there is any reason to be afraid,” she said smiling. The naughtiness in her eyes was clearly visible. “When I was a kid my father used to tell me that we have a body and a soul but the ghosts have no bodies. So we are more powerful than them. This was enough of a reason for me for not getting afraid of ghosts.” I could easily make out from her face that she missed her childhood. “You love your father a lot, don’t you?” I asked though I was still not clear about love. “Yes, actually dad always teased mom that I love him more than I loved her.” Her eyes lit up as she said this. “What does he do?” I asked. “He runs a transport company.” She continued “he is my best friend.” She was in a different world now. “Do you know who my best friend is?” I asked. “I think I know. The trees at your farm aren’t they?” she guessed. Although they were among the best friends of mine, but there was some one else who was the best of them all. I took her outside and pointed towards the sky. She was puzzled. “Do you see that? Orion, he’s my best friend.” I said pointing to Orion, a constellation.
She was puzzled. “When I was a child I had very few friends. We had this big mansion in central Indore. There were lots of trees in our house. Many birds and animals dwelled on them; we even had a small pond full of fishes. The trees and plants, the birds and the squirrels, the fishes and the flowers were my friends. During the daytime I spent most of my time with them. But at night I was not allowed to go there. At night after I had my meals I used to go to the backyard and watch the stars. There were these three stars arranged in a line that I thought of as a stick. In class 5th or 6th I came to know it was the Orion’s belt. It was then when our friendship started. Few years from then, we left our house and moved into a flat. I lost all my friends. The trees were chopped down and eventually the creatures dwelling on them moved elsewhere. But the one friend that remained with me was Orion. The best part of our friendship is that he travels with me wherever I go. Apart from him I have the trees at the farm.” I went deep into my childhood, memories of leaving our home and separating from my friends came back to me.
“Each star in that constellation is so many light years away from each other.” She said with an explanatory tone. “Yes-yes, I know everything about Orion, even the mythological part of it. The Greek, Indian and the Chinese.” I said, after all we were the best pals. “In Chinese philosophy they believe in two principle forces of nature yin-yang.” She said. “Yes. Yin represents female force and yang represents the male.” I added. I had read about it somewhere I don’t remember. “There’s another explanation for it. Yin, which represents the feminine force, also represents the night. It is amazing the way you are fascinated by the night sky. Surely, you are attracted towards yin.” She was on to raillery me.
“One more thing, this may sound foolish to you. Listen, my initials are KR and yours are RK. So in a way we both are opposite and complementary to each other. Just like yin and yang.” She was sounding childish. “And this suggests that we both are made for each other.” I said jesting and both of us broke into laughter.

*******

We went inside the temple. Although the serene settings provided freshness to our minds, the bodies were experiencing fatigue. I fell asleep. A thought about everyone at home kept reoccurring to my mind. I realised how tensed they would be to find out that I was missing. And what about Mrs. Rajput? They might take a boatman and come looking for us here. I must go to they riverbank. As I opened my eyes to go to the bank I saw a face staring at me. It scared me; I was not able to recognize it. I thought of running but found that I could not get up. My body was paralysed, maybe due to fear. I felt the pumping of my heart in my ears. As I tried to gather all my energy to get up, the haziness due to the exhaustion was wiped away. My vision got cleared. I found that the face looking at me was none but hers. I breathed a sigh of relief. She was looking at me.

“What happened? You look terrified.” She asked me. I got up. The words were not coming out of my mouth. Her face was placid contrary to the excited one; her eyes were lit up contrary to the peaceful eyes, her hair…. Suddenly she started changing. Her face turned into that of a male. I knew to whom she turned into, it was me. I was scared to death. The chill in the air went through my spine. I ran, I ran into the woods. The leaves cracked beneath my feet. The branches bruised my arms. I was running; it was a moonlit night. After few minutes my body gave way and succumbed to the fatigue. I fell on the forest floor. I could not move. Blood was flowing through a dozens of holes, made by the thorns, all over my body.
What was it? Was it a ghost? Yes it was surely a ghost. It couldn’t be her. Suddenly a thought struck my mind; what about her? Where is she? I have to retreat for her. I laid there for a while trying to lift my ailing body and then I heard a cry. Somebody was calling my name; it was she. I ran towards the voice. It was coming from the bank. As I reached there I saw a silhouette standing there calling my name. I thought it was her, but when it turned I saw, it was not her. It was the other I. I was confused, terrified and devastated. I turned back to run. A cold sensation jabbed my left leg and then a sting.
It was black and long. The cobra venom kills in less than 12 seconds. Already I was on the ground. The other me came closer and the snake went into the bushes. He was crying; he sat besides me. And then I realised it wasn’t any ghost it was actually her who turned into me. Now I knew what she meant when she said ‘love is death’. Her words echoed in my mind.
It felt light, very light much like it did when she first hugged me. I could see my body lying on her lap. She was still crying. It took me some time to understand that I was dead. I was not feeling sad or mournful. For most of the people death of a loved one is a very painful experience, but what about the one who dies? If you ask me it is the most heavenly experience. It feels like a long lasting thirst is about to be quenched, an eternal quest is about to end. I will soon achieve my love. I felt fortunate, for who would be so fortunate to die in the hands of the one who loved you and to pass on to the one you love. If death is like this, I would like to die everyday.

She was still me and I was now nobody.

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