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चंद्रग्रहण – २

मीठे नींद में डुबे शंकर के आनंद में तब खलल आ गया जब उसके चेहरे पर हलकी हलकी पानी की फुहार आने लगी। आधी कच्ची आधी पक्की नींद में जब उसने आँखे खोली तो देखा कि झोपडी की खिड़की खुली हुई है और उसमे से हवा के साथ बारिश का पानी भी अन्दर आ रहा है। नींद टूटने से शंकर थोडा  सा झुंझला सा गया था। उसने जैसे ही खिड़की बंद करने के लिए उठना चाहा, बाहर टंगे लालटेन की ज़मीन पर पड़ती रौशनी में उसे एक परछाई दिखी। और अगर वो एक साधारण परछाई होती तो शायद शंकर की सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे नहीं रुक जाती। परछाई एक लाश की थी जो झोपडी के छप्पर से लटक रही थी, हवा उस लाश को अपने साथ दाये-बाए हिलाए जा रही थी । कुछ क्षणों के लिए शंकर समझ न पाया कि क्या करे! फिर उसने धीरे से खुद को खिड़की के पास खिंचा तो पाया कि जो छप्पर से लटक रही थी वो कोई लाश नहीं थी। बल्कि किसी ने खेत से ला कर काकभगोडे को टांग दिया था।

“कोई पागल ही ऐसा कर सकता है!” शंकर ने बुदबुदाया

शंकर अब भी आश्चर्यचकित था, मगर अब उसके दिल से वो दहशत जा चुकी थी जो परछाई को देखते ही उसे महसूस हुई थी। वो आस पास का जायजा लेने जब पीछे मुड़ा तो उसने पाया की चूल्हे पर रखा वो बर्तन गायब है। उसकी समझ में आ गया कि जब वो सो रहा था, जरूर झोपडी का मालिक वापस आया होगा। काकभगोडे को टांगने वाली करतूत भी हो न हो उसी की होगी। शंकर उसे धुन्धने झोपडी के बहार आ गया। हवा अब और उग्र हो चली थी। लालटेन की लुपझुप करती लौ देख शंकर को दिए और तूफ़ान वो पौराणिक संघर्ष याद आ गया। जाने क्या सोच कर उसके परेशान चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गयी।

शंकर ने उस काकभगोडे को नीचे उतरने के लिए जब पकड़ा तो देखा कि काकभगोडे के आँख, नाक और मुंह बना दिए गए थे। जिस लाल रंग से उन टेढ़ी मेढ़ी आकृतियों को बनाया गया था वो अभी तक सुख भी नहीं था। शंकर ने काकभगोडे  को उतार कर ज़मीन पर धर दिया। ओटले के किनारे पर ही वो बर्तन भी रखा था जो पहले शंकर ने चूल्हे पर रखा देखा था। जब शंकर ने ध्यान से देखा तो पाया बर्तन में अभी भी कुछ रखा हुआ था, पास जाने पर उसने जो देखा उससे उसे एक लघु हृदयाघात आ गया। बर्तन के अन्दर एक कुत्ते का सर था। शंकर वही का वही ज़मीन पर बैठ गया। यह सब क्या हो रहा था उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। उसकी तार्किक शक्ति उसका साथ छोडती सी मालुम हो रही थी। जो कुछ आज रात उसके साथ हो रहा था, उस सब की व्याख्या शायद ही कोई विज्ञान दे सकता था। पर यह सब हो तो रहा था, वो चाहे मने या न मने। कुत्ते का सर देखते ही उसे लगा था की ये उसी कनकटे कुत्ते का सर होगा। न जाने क्यों आज रात घूम फिर कर शकर का सामना उस कनकटे कुत्ते से हो रहा था।

उसने हिम्मत जुटा कर अपने दर की पुष्टि करने के लिए ज्यो ही बर्तन में झाँका, एक अशांत से अट्टाहस ने उसकी रूह को कंपा दिया। कुत्ते का कान तो कटा हुआ ही था, लेकिन यह हंसी किसकी थी। पहले तो उसे लगा कि लक्कड्बग्घो की आवाज़ है, लेकिन तुरंत ही उसका यह कयास असत्य सिध्द हो गया। सामने से एक अधनंगा व्यक्ति हाथ में कुल्हाड़ी लिए पागलों सी चाल में शंकर की तरफ बढ़ा जा रहा था। वो पागल आसमान को ताकता बेतरतीब सा शंकर के बिलकुल पास आ गया। जब शंकर ने ध्यान से देखा तो पाया कि वो तो पागल रामकृष्ण ही था। तो क्या वो अपने गाँव के इतना करीब आ गया था, कि रामकृष्ण के खेत में पँहुच चूका था? रामकृष्ण को देख उसके खोये होश वापस आये। मगर कुत्ते के सर को पकाने का वाली बात उसके समझ न आई। रामू पागल तो था पर ऐसी हरकते गाँव में तो नहीं करता था।

“तूने उसे बचा लिया?” रामकृष्ण ने चीखते हुए शंकर से पूछा

 

“किसे?”

“इसे, तेरी भाभी को।” पगले ने काकभगोडे की और इशारा करते हुए बोल

“अरे, ये लक्ष्मी भाभी नहीं है। बस एक काकभगोडा है, बस। लक्ष्मी भाभी तो मर चुकी है ना ।” उसने रामू को समझाने की कोशिश की

यह सुनते ही रामू फिर अपने भयावह अंदाज़ में हँसने लगा।

“तू भी बाकी सब की तरह पागल हो गया है, शंकर” उसने कहा

यह सुन कर शंकर को क्षण भर के लिए हँसी आ गयी। खुद पागल हो कर यह पगला मुझे पागल बोल रहा है। उसने सोचा कि जाने दो इससे बहस करके कोई फायदा नहीं है, मैं कुछ करके यहाँ से निकलता हूँ।

“माफ़ कर दे भाई, मैं इसे वापस टाँग देता हु” कहते हुए शंकर ने काकभगोडे को वापस छप्पर पर टाँग दिया

रामू सर हिलाने लगा। “अब कोई फायदा नहीं। वो तो चली गयी ना।” इतना कहते कहते रामू ने शंकर का हाथ पकड़ लिया। शंकर पूरी तरह सतर्क हो चूका था। वो रामू की और से आने वाले किसी भी प्रकार के हमले के लिए तैयार था।

“चल, आ मैं मिलवाता हु तुझे उससे।” रामू ने उसे खींचते  हुए कहा

“नहीं नहीं, मैं घर जाता हूँ ” उसने कहा 

“नहीं” रामू चिल्लाया “अब तू नहीं जा सकता, वो तुझे जाने नहीं देगी, इतना आसान नहीं है।”

शंकर रामू के ऐसे बर्ताव को देख कर घबरा गया। इसके पहले रामू को कभी इतना उग्र उसने नहीं देखा था। सीधा सादा रामू, गाँव में रोज सुबह हर आने जाने वाले को ‘राम-राम’ करता था। गाँव के बच्चे उसका मज़ाक बनाते कभी उसका सामान छुपा देते तो कभी उसके पीछे टिन के खाली डब्बे बांध देते। मगर रामू बस उन उत्साहित बच्चो को देख कर हँसता रहता। लोग ज़रूर कहते थे कि कई साल पहले उसने अपनी बीवी, लक्ष्मी को मार दिया था। लेकिन शंकर को इस बात पर मुश्किल से ही यकीन होता था।

रामू अब शंकर को खींचता हुआ अँधेरे में ले जाता जा रहा था। शकर ने हाथ चुदने की पुरजोर कोशिश की पर न जाने कहाँ से उस पागल में उतनी शक्ति आ गयी थी कि शंकर जैसा हट्टा-कट्टा युवक भी हाथ नहीं छुड़ा पा रहा था।

इससे पहले कि वो कुछ समझ पता, रामू उसको एक आम के पेड़ के पास ला चूका था।

“यही रहती है वो। रोज़ मुझे यहाँ बुलाती है।” आँखें मटकाते हुए रामू ने हौले से शंकर के कान में कहा

“वो जो घर में खाना था न, इसी के लिए बनाया था। इसी बहाने तो इसको घर तक लाया था। पर तूने उसे भगा दिया। नालायक।” ये कहते हुए रामू की आँखें अंगारों की तरह जल उठी, नथुने फूल गए। पूरी रात में पहली बार शंकर बुरी तरह से डर चूका था। उसने अपने हाथ को एक झटके से रामू की पकड़ से छुड़ा लिया।

“वो देख” रामू ने लालटेन पेड़ की ओर की और अजीब सी भाषा में कुछ बोलने लगा। पेड़ उन दोनों से कुछ गज की दुरी पर था, अँधेरे में लालटेन की रौशनी जैसे ही पेड़ पर पड़ी कुछ सरसराहट सी हुई। शंकर न चाहते हुए भी उस ओर देखता रहा। पत्तो की आड़ में शंकर को दो आंखें दिखी, जो लालटेन की रौशनी से टिमटिमाने लगी थी। बिना कुछ सोचे शंकर वहाँ से भाग। पीछे से रामू के चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी। कुछ दूर जा कर जब उसने देखा तो रामू पेड़ पर  अंधाधुंध कुल्हाड़ी मार रहा था। उसने वहाँ से भाग जाना ही बेहतर समझा। जैसे जैसे वो दूर जाता जा रहा था, रामू की आवाज़ हलकी और भ्रामक होती जा रही थी। उसे लगा कि रामू किसी से झगडा कर रहा था, शायद किसी महिला से।

बेतहाशा भागता हुआ शंकर वापस रामू की झोपडी पर आ पंहुचा। उसने अपनी साइकिल ली और बिना वक़्त गंवाए रवाना हो गया। बारिश तो अब थम चुकी थी, ग्रहण भी छुटने को था। चन्द्रमा की हलकी हलकी दुधिया रौशनी से थोड़ी दृष्टता लौट रही थी। शंकर अपनी पूरी उर्जा से पैडल चला रहा था। भूख प्यास से बेहाल हो चुके उसके शरीर में अब कुछ ख़ास ताक़त बची नहीं थी। ये तो उसका निश्चय ही था जो उसे जिलाए हुए था। आँखों की पलके अब कई मनो के भार के नीचे दबती जा रही थी और सोचने की शक्ति अब क्षीण हो चुकी थी।

एक बार फिर शंकर को दूर कुछ रौशनी सी दिखाई पड़ी। वो उस ओर बढ़ चला। लेकिन इस बार वो सतर्क था, कि कही फिर किसी सरफिरे के घर न पहुच जाए। झोपडी के बाहर लालटेन आँगन में रखी हुई थी। जैसे ही उसने झोपडी के बाहर साइकिल रोकी, अन्दर से एक चितपरिचित आवाज़ उसे सुनाई पड़ी। इसमें कोई शक न था कि वो आवाज़ रामू के हंसने की थी। मगर शंकर को इस बात पर अब भी विश्वास न हुआ। वो जब रामू की झोपडी से निकला था, तब से अभी तक उसने नाक की सीध में ही साइकिल चलायी थी। घूम कर वापस वह पहुचने का तो सवाल ही नहीं उठता था। इतना सब हो जाने के बाद भी उसके अन्दर कहीं एक तार्किक जीवित था। वो साइकिल रख कर दरवाज़े की ओर बढ़ा।

“मैंने कहा था, कि इतना आसान नहीं है।” रामू ने अंदर से अट्टाहस करते हुए कहा

शंकर की नींद अब पूरी तरह उड़ चुकी थी। उसने साइकिल उठाई, फिर से उसने पूरी ताकत से पैडल चला शुरू कर दिए। वो यही सोच रहा था कि अगर इस दिशा में जा कर वो वापस शंकर के घर पहुचता है तो शायद वो सीधे नहीं एक चक्कर में जा रहा है। इस बार उसने इस बात का ख्याल रखा कि वो साइकिल सीधी, बिलकुल सीधी चलाये।

काफी देर बाद, उसे फिर से एक झोपडी दिखी। वो मन ही मन यह मना रहा था कि इस बार तो वह किसी और की झोपडी पर पंहुचा होगा। मगर उसके सारी धारणाएं एक ही पल में चकनाचूर हो गयी। इस बार तो रामू बहार आँगन में ही खड़ा था और उसे लगातार घुर रहा था।

“मत भाग, वो तुझे जाने नहीं देगी।” उसने कहा “चल हम दोनों उसको ख़त्म कर देते है।” ये कहते हुए रामू उसकी ओर बढ़ा।

“देख रामू, तूने अगर एक कदम भी इस ओर बढाया तो अच्छा  नहीं होगा।” उसने रक्षात्मक रुख अपनाते हुए कहा “इससे मेरा कुछ लेना देना नहीं, और उप्पर से मैं इन सब चीज़ों में नहीं मानता।” शंकर ने अपनी दलील दी।

“तुझे क्या लगता है कि लक्ष्मी मर गयी है, और उसकी आत्मा मुझे परेशान कर रही है?” रामू ने अपने सड़े दांत दिखाते हुए पूछा “वो नहीं मरी है, और न ही उसकी कोई आत्मा है। वो तेरी मेरी तरह नहीं है रे।” अब बात शंकर के समझ से परे जाती जा रही थी।

“ये बात तो मुझे शादी की पहली रात ही पता चल चुकी थी। मगर किसी ने मेरा विश्वास ही नहीं किया।” वो बोलता जा रहा था और शंकर बुत सा खड़ा सुनता जा रहा था। कुछ जाने की जिज्ञासा मनुष्य में एक ऐसा जूनून उत्पन्न कर देती है कि हर डर, हर खतरा उसके आगे छोटा लगने लगता है।

“हर रात वो मुझे खेत पर ले आती, फिर न जाने क्या क्या करने लगती। उसकी करतूतों से ही मेरी ज़मीन बंजर होती गयी।” रामू की आँखों में एक शोक सा भर आया था। “कितनी कोशिश करी मैंने उससे पीछा छुड़ाने की। तुझे भी बोल था मत आ, नहीं बचेगा।” ये कहते हुए उसके चेहरे के भाव अचानक वेहशी हो गए। वो शकर की और बढ़ा। शंकर ने उसे एक जोरदार धक्का दिया, जिसके चलते दोनों ज़मीन पर गिर गए। रामू का कन्धा पीछे पड़ी उसकी कुल्हाड़ी पर जा लगा। वो चीख उठा।

शंकर ने आव देखा न ताव। अपनी साइकिल उठा कर वो निकल पड़ा उस जगह से दूर। पीछे से अजीब सी हंसने की आवाज़े उसकी हृदयगति को बढ़ाये जा रही थी। वो आवाजें और तेज़ होती जा रही थी। पहले तो केवल रामू के चीखने की आवाज़ थी, पर धीरे-धीरे उसमे किसी और के रुदन और फिर लक्कड्बग्घो के रोने की और कई सारे उल्लुओं की  आवाज़ें मिलते गयी। शंकर पसीने में तरबतर निरावाकाश साइकिल चलता जा रहा था।

उस आवाजों को वो नज़रंदाज़ तो नहीं कर सकता था, पर उसे पता था कि अगर वो वहाँ से नहीं निकला तो उसके लिए अच्छा नहीं होगा। इस सब में एक बात तो उसके समझ बिलकुल नहीं आई, वो ये थी कि रामू ने उसे कब मन किया था कि इस ओर मत आ। और फिर उसको वो वाकया याद आया जो इन सब अनहोनी घटनाओ का अगुवा था। वो कनकटा कुत्ता। और कहीं न कहीं घूम फिर के उससे शंकर का सामना हो ही रहा था।

जो कुछ भी हो रहा था, वो सब उसकी समझ और उसके ज्ञान की व्याख्या से परे था। अब शंकर का शरीर जवाब दे रहा था, मगर उसका जज्बा उसे आगे बढ़ने को प्रेरित कर रहा था। रात का आखिरी पहर चल रहा था, दूर क्षितिज पर हलकी मधिम लालिमा दिखने लगी थी। उसके पेर पैडल पर ढीले हो चले थे। शरीर के कोने से शक्ति को खींच कर वो जैसे तैसे आगे बढ़ता जा रहा था।  उन आवाजों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा था। जाने क्या चल रहा है, और इस सबका अंजाम जाने क्या होगा। लेकिन एक बात तय थी, हार मान लेना उसके लिए एक विकल्प नहीं था। अगर वो आज हार मान लेता है तो, माँ का क्या और उसके छोटे भाई-बहनों का क्या।

नहीं। मुझे घर पहुचना ही होगा। उसने खुद से कहा और फिर एक बार साइकिल पर अपनी पूरी ताकत झोंक दी। पता नहीं कब, यूँ ही संघर्ष करते-करते वो ज़मीन पर गिर पड़ा। माँ का परेशान चेहरा उसे उप्पर बादलो में दिखाई दे रहा था। वो चाह रहा था कि माँ से कहे कि घर पहुच रहा हु, पर उसके शरीर ने होंठ हिलाने की भी शक्ति नहीं थी। धीरे से उसके मस्तिष्क ने भी उसका साथ छोड़ दिया, और वो वही मूर्छित हो गया।

 

शंकर की आँख खुली तो उसने पाया कि सुबह हो चुकी थी। रोटी सिकने की खुशबु घर में फैली हुई थी। उसने एक गहरी सांस भरी। कुछ क्षण के खालीपन के बाद अचानक उसके दिल में उस रात का ख्याल आया। और वो  गया! क्या वो जिंदा था? उसे तो यकीन था कि वो नहीं बचेगा।

“उठ गया तू…” माँ ने उसके सिरहाने दूध का गिलास रखते हुए कहा। और फिर आँखें बंद कर कुछ बुदबुदाने लगी। “…ले दूध पी” कह कर वो चोके की ओर चली गयी। दूध का गिलास होंठों से लगते ही शंकर को एहसास हुआ कि वो कितना भूखा था। शंकर ने एक घूंट में सारा दूध पी लिया। माँ अन्दर से कुछ लाल मिर्चें मुट्ठी में बाँध कर ले आई और शंकर की नज़र उतरने लगी। शंकर को अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि वो जीवित था। लेकिन जो कुछ उसके सामने हो रहा था उससे तो यही अर्थ निकल रहा था कि  वो सही सलामत था।

“क्या कर रही है?” शंकर ने पूछा तो माँ ने इशारे से उसे चुप रहने का आदेश दिया। माँ ने कई बार मिर्चियों को उसके सर से पाँव तक घुमाया और फिर अन्दर चोके में चली गयी और उनको जला दिया।  मिर्ची जलने की तेज़ ढान्स से शंकर खांसने लगा।

“तू अब ऐसे किसी उटपटांग काम के लिए बखत-बेबखत इधर उधर नहीं जाएगा।” माँ ने गुस्से में उससे कहा

“मेरी तो जान ही निकल गयी थी। न जाने सारी  रात तू कहाँ था। वो तो भला हो उस लड़की का जिसने तुझे गाँव के बहार बेहोश होते देख लिया।” यह सुनते ही शंकर का सर चकरा गया। किस लड़की ने उसे बेहोश होते देखा? उसने तो उस वक़्त आस-पास किसी को नहीं देखा था। वो हर पल आश्चर्यचकित, और ज्यादा आश्चर्यचकित होता जा रहा था।

“कौन?” अनायास ही उसके मुंह से निकल पड़ा

“अपने गाँव की नहीं है। पर बहुत भली है है। बहार झाड़ू लगा रही है।” माँ ने हल्की सी हंसी के साथ कहा

तभी एक सकुचाई सी आकृति कमरे में दाखिल हुई। सांझ के ढलते सूर्य की किरणे उसके ताम्ब्र वर्ण को और भी स्वर्णिम बना रही थी। दिन भर के काम से शायद उसके केश जो सुबह एक स्पष्ट छोटी में गुंथे हुए थे, अब स्वतंत्र हर ओर हवा में  डोल रहे थे। और उसकी आँखे झिलमिलाते दीपक सी, जैसे ही शंकर की दृष्टि से सम्मुख हुई तो छुईमुई सी सकुचा गयी।

शंकर अपने होश खो चूका था । वो भूल गया था कि एक रात पहले ही उसके साथ क्या हुआ था, वो भूल गया था कि कुछ पल पहले उसको अपने जीवित होने पर भी संदेह हो रहा था। उसे याद रहा तो बस उस युवती का शर्मीला चेहरा।

“लग गयी झाड़ू?” माँ ने उससे पूछा तो शंकर को एहसास हुआ कि कमरे में उसके और उस लड़की के अलावा कोई और भी था।

“बेटी, देख शंकर को होश आ गया। अगर तू नहीं होती तो न जाने ये नालायक खेतों में कब तक यु ही पड़ा रहता ।” माँ ने वक्र दृष्टि से शकर की और देखा। ” इसलिए ही बड़े-बूढ़े ग्रहण के वक़्त निकलने से मना करते है।” ये कहते हुए माँ फिर चोके  की और बढ़ चली। शंकर अभी भी एकटक उस लड़की को निहार रहा था। और वो वहाँ कड़ी शर्म में डूबी जा रही थी।

कमरे में एक बैचैन सी ख़ामोशी थी। “हमारी भैंस कैसी है माँ?” उसने बात पलटने के लिए माँ से पूछा

“बेटा उसने तो रात में ही दम तोड़ दिया।” माँ ने धीमी आवाज़ में कहा, शायद वो शंकर की चिंता को कम करना चाहती थी। लेकिन शंकर के दिमाग से सारी फ़िक्र, सारी चिंता काफूर हो चुकी थी। उसे प्रेम हो गया था।

वो लड़की शंकर के घर में ही रहने लगी। कुछ महीनो बाद शंकर ने उस लड़की से अपने प्यार का इज़हार कर दिया । और उसने भी शर्मा कर, लजा कर एक रुकी सी हामी भर दी। शंकर को तो लगा जैसे उसके जीवन को अपना मतलब मिल गया, शायद ही गाँव में शंकर से ज्यादा खुश व्यक्ति कोई होगा। माँ को तो वो पहले ही पसंद थी, पर शंकर के बाबूजी इस रिश्ते से नाखुश थे। लेकिन उनका मत शंकर के लिए कुछ ख़ास मायने नहीं रखता था।

कुछ ही दिनों में दोनों की शादी हो गयी। शादी के पहले ही महीने में शंकर की माँ चल बसी। बीमार तो वो कई दिनों से थी, और इसीलिए उसने जल्द से जल्द शंकर की शादी करा दी थी ताकि अपने रहते वो शंकर की शादी देख ले। शंकर शादी के बाद से गाँव के लोगो से कटा-कटा सा रहने लगा था, और माँ के बाद तो उसने किसी से भी मिलना बंद कर दिया था। दिन हो या रात, बस खेत पर ही काम करता रहता था। और वहाँ भी उसे लगातार निराशा हाथ लग रही थी। जिस साल पुरे गाँव की फसल अच्छी होती उस साल भी शंकर के खेत में बमुश्किल कुछ पैदा होता।

लोग कहने लगे कि शंकर पागल होता जा रहा था। नहना धोना उसके छोड़ दिया था, घर में रहना भी एक दी उसने छोड़ दिया। गाँव के चौक पर पड़ा रहता था। और एक दिन उसकी बीवी भी न जाने कहाँ चली गयी। लोगो ने आखिरी बार उसको शंकर के साथ एक रात को खेत में जाते हुए देखा। और फिर अफवाहे उड़ चली। शंकर ने भी रामू की ही तरह अपनी बीवी को मार डाला। या, उससे तंग आ कर उसकी बीवी भाग गयी। सच कोई नहीं जानता था। शंकर के भाई-बहिन भी नहीं। वो तो जैसे-तैसे इधर उधर काम करके अपना पेट पाल रहे थे।

रात होते ही शंकर खेत की ओर चल देता। वहाँ एक जामुन का पेड़ था, उसी के नीचे वो सोता था। उसके साथ एक कनकटा कुत्ता भी रहने लगा था। कुछ लोगो का कहना था कि हर रात शंकर उस पेड़ से न जाने किस भाषा में बात करता था।

फिर एक दिन किसी ने कहा कि शंकर के खेत में उसकी पत्नी की आत्मा भटकती है!

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चंद्रग्रहण – 1

बात उन दिनों की है जब न TV था, न कंप्यूटर, न ही आज की तरह मोबाइल फ़ोन हुआ करते थे की कहीं भी हो एक नंबर घुमाया और मनचाहे व्यक्ति से बात हो गयी | बात है १९४० के दशक की, भारत आज़ाद हुआ ही था | पुरे देश में, खासकर के नौजवानों में एक नया उत्साह था, नयी उमंग थी | ऐसा ही एक उत्साही नौजवान था, शंकर | वैसे तो शंकर ने इंटर पास कर लिया था, जिसके आधार पर उसी कहीं भी अच्छी नौकरी मिल सकती थी| मगर उसने अपने गाँव में ही रहना बेहतर समझा| ३-३ छोटे भाई बहनों की परवरिश का बोझ उसके कन्धों पर ही था| वैसे तो उसके बाबूजी अभी तक चलते फिरते थे, लेकिन कमाने का हुनर उनमे न था| वो तो मलंग थे | गाँव के नजदीक ही एक खेडा था, उसी खेड़े की सीमा पे एक प्राचीन शिव मंदिर था | कहते है उस मंदिर को कोई १२०० साल पहले बनाया गया था, और जब से वो मंदिर बना है तब से शंकर के पुरखे उसके पुजारी हैं | शंकर के बाबूजी भी अपनी पुश्तैनी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मंदिर से लग गए | पहले तो सब ठीक था लेकिन शंकर के सबसे छोटे भाई गणेश के पैदा होने के बाद से पता नहीं क्या विरक्ति हुई कि शंकर के बाबूजी, मुरली ने घर-बार छोड़ दिया और मंदिर में ही ठिकाना जमा लिया | दिन भर वहीं, कभी गांजे तो कभी भांग के नशे में पड़े रहते  | जिस तरह भारत में साधुओं की कमी नहीं उस तरह ही उनके मानने वालो की भी कमी नहीं है | जिस खेड़े की सीमा पे वो मंदिर था वहाँ के लोग मुरली बाबा को बड़ा मानते थे | शंकर के गाँव में भी कई लोग उनके भक्त  हो गए थे | पर शंकर को यह बात बिलकुल नहीं जँचती थी | जब से मुरली घर छोड़ गया था पुरे परिवार का बोझ उसकी माँ शारदा के कंधो  पर ही था| शारदा की सास बहुत खडूस थी| खैर सास तो मिटटी की भी बुरी होती है मगर सास के साथ  ४-४ बच्चो का बोझ और उनकी पदाई-लिखाई, फिर भी शारदा ने कभी अपना मन छोटा नहीं किया | अपनी जमीन किराये पे दे दी क्यूंकि अकेले उससे खेती होने की नहीं थी| दुसरो  के खेत में मजदूरी करके शारदा ने जैसे तैसा शंकर को बड़ा किया |

शंकर ने अपने बाबूजी की तरह मंदिर का रास्ता नहीं किया | मंदिरों  से तो वो बचपन से ही बिदकता था| एक बार उसके बाबूजी ने उसे मंदिर के लिए फूल तोड़ने भेजा| फूल तोड़ने के लिए जब शंकर झाड़ियो  में घुसा तो वहाँ कोई जंगली कुत्ता सुस्ता रहा  था | जैसे ही शंकर का पैर उसकी दुम पे पड़ा उसने पलट के शंकर की जांघ में एक जोरदार बल्ला भरा| तब से शंकर मंदिर और मंदिर के कामो से दूर ही रहने लगा | बाद में बाबूजी के इस तरह परिवार को छोड़ देने से मंदिर से उसकी दूरी और बढ़ गयी | वैसे इश्वर से उसकी कोई दुश्मनी नहीं थी मगर वो खुद पर और खुद के कर्म पर ज्यादा विश्वास करता था |  धुन के पक्के इस लड़के ने अपनी तरुणावस्था में ही मन बना लिया था कि वो अपनी पुश्तैनी जमीन पर खेती करेगा | इंटर पास करने के बाद वो गाँव वापस आ गया और वहीं खेती करने लगा, शाम को वो गाँव के बनिए-महाजनों के बच्चो को पढ़ा दिया करता था |

शंकर जब घर से निकला तब उसे अंदाजा नहीं था कि आज वो क्लास नहीं ले सकेगा | “आज ग्रहण है, रात होने से पहले आ जाना ” शारदा ने कहा था उसे जब वो अपनी साइकिल लिए आँगन से बहार निकल रहा था | शारदा को मालूम था कि मना  करने से शंकर रुकने वाला नहीं | काम भी कुछ ऐसा ही था| ३ दिन पहले शंकर की सबसे दुधारो भैंस का पाड़ा  ठण्ड के मारे परलोग सिधार गया था| पाड़े की मौत का सदमा भैंस को ऐसा लगा कि उसके थन सुख गए | दुधारू पशु का अगर दूध नहीं निकालो, या दूध देते देते वो अचानक बंद कर दे तो जल्दी ही वो बीमार पड़ जाता है  यु तो जाने अनजाने सारे इलाज़ आजमा के देख चूका था अपनी भैंस पे लेकिन कुछ असर नहीं हुआ| अगर इसी तरह चलता रहा तो भैंस की जान को खतरा भी हो सकता था | अगर भैंस का सही इलाज़ नहीं हुआ तो जो महीने के महीने दूध बाँट के घर में पैसे आते है वो बंद हो जाएँगे, खेती से तो साल में सिर्फ दो ही बार कमाई होती है  | नयी  भैंस खरीदने  के लिए उसे अगली  फसल  के आने  तक  रुकना  पड़ता ,  इसी  चिंता के चलते शंकर ने आज तहसील में बने जानवरों के अस्पताल जाने का मन बना लिया था|

अस्पताल गाँव  से कुछ २०-२५  मील  दूर  तहसील में था, घर से निकलते समय शंकर ने सोचा था कि दिन ढलने  से पहले वो वापस  तो आ ही जाएगा  | साइकिल चलने में वो अव्वल  था | मगर  सरकारी  अस्पतालों  का हाल  आज जैसा है उसे देख के यह  अंदाजा तो लगाया ही जा  सकता है कि तब कैसा  होगा | वहाँ  पहुच  कर शंकर को पता  चला  कि डाक साब  तो अस्पताल का चक्कर महीने में एक-दो बार लगाते  हैं | उनके  पीछे  एक  कम्पाउण्डर  है जो वहाँ  का काम काज  देखता  है और  उस  दिन तो वो भी  अस्पताल नहीं आया था | मगर  शंकर दवा लिए बिना जाने वाला कहाँ  था | लोगो  से पूछ  के कम्पाउण्डर  को ढूँढा, फिर  उसकी बड़ी जी हजुरी करके उससे दवा ली | ये सब करते करते सूरज पश्चिम को प्रवास कर चूका था| अगर शंकर कि जगह और कोई होता तो एक बार सोचता भी, लेकिन उसको तो धुन चढ़ गयी सो चढ़ गयी | उसने सोच लिया था कि आज भैसी को दवा दे के रहेगा, उसे न रात कि फ़िक्र थी न अँधेरे की| फिर उन दिनों संचार के इतने साधन नहीं थे की शंकर रात को वहीँ रुक जाए और माँ को खबर कर दे, माँ तो चिंता करेगी ही|

 

शंकर के गाँव जाने का रास्ता बहुत टेढ़ा था,  सड़के तो उन दिनों सिर्फ शहरो में हुआ करती थी| और ऊपर से ग्रहण वाली रात |  कोई कमजोर जिगर का होता तो रुक ही जाता | मगर शंकर ने बिना सोचे अपने साइकिल उठाई और तेज़ तेज़ पैडल मरने लगा| जानवरों के अस्पताल से लग कर एक कच्ची-पक्की  सड़क जाती थी | जो आगे जा के एक पगडण्डी में बदल जाती थी | इसी पगडण्डी से होकर, खेत-बड़ियो को लांघते हुए शकर को अपने गाँव पहुचना था |

 

जब से शंकर अस्पताल से निकला था, एक कनकटा कुत्ता उसके साथ हो लिया था | शंकर ने दिन में भी इस कुत्ते को देखा था, वो दिन भर अस्पताल की पेडियो  पे सोया पड़ा था| पहले  तो शंकर को लगा कि शायद थोड़ी दूर तक आके के वापस लौट जाएगा, मगर कुकुर महोदय का  लौटने का जी ही नहीं कर रहा था | एक बार तो शंकर ने सोचा कि पलट कर इसको भगा देता हूँ, फिर उसे लगा कि मेरा कुछ बिगड़ तो नहीं रहा साथ चलता है तो चलने दो | जल्दी ही शंकर गाँव कि सीमा से बाहर आ गया, पगडण्डी छोड़ के उसको खेतो कि मेढ़ो पे से निकलना पद रहा था|  कभी साइकिल पे तो कभी साइकिल हाथ में लेके, नाले-बावड़ी पार करते  करते वो बस्ती से बहुत दूर आ पंहुचा था |  अभी तो पूर्णिमा का चाँद पुरजोर रौशनी फैला रहा था मगर बीच बीच में बादलो के टुकड़े उसे ढँक कर राहगीर के लिए मुश्किलें बढ़ा रहे थे | पोश माह चल रहा था और बादलो को देख के कहा जा सकता था कि मावठा किसी भी पल आ सकता था | ठण्ड तो पहले ही बहुत थी और खेतो में गेहूं  की फसल के लिए छोड़े गए पानी से उसका पैनापन और बढ़ गया था|

अभी खेतो की कच्ची मेढ़ो के एकदम नए रस्ते पर शंकर ने चलना शुरू ही किया था की उसकी साइकिल के पहिये गीली नर्म जमीन में धंसने लगे | शंकर ने साइकिल से उतर कर साइकिल को कंधे पर चढ़ा लिया, और गीली जमीन पार  धीरे धीरे चलने लगा | जो कुत्ता इतनी देर से शंकर के पीछे पीछे चल रहा था वो अब उसके आगे आगे हो लिया |  चाँद और बादलों की लुका छुपी के चलते रस्ते का सही अंदाजा लगाना  मुश्किल हो रहा था,  कुत्ते के आगे चलने से शंकर को एक फायदा तो हो ही गया कि अब उसे ठीक ठीक मालूम था कि कहाँ पैर रखना सही है | कुत्ता थोड़ी देर चलता और फिर जब उसे एहसास होता कि शंकर पीछे रह गया है तो वो रुक कर शकर के आने का इंतज़ार करता |  ऐसा करते करते दोनों मुसाफिर खेतों की कतार के अंत में पहुच गए | वहाँ से आगे एक खोदरा था, जो खेतों को बीच से काटता हुआ निकल रहा था | खोदरा इतना चौड़ा था कि दो बैलगाड़ियां उसमे से आराम से निकल जाए और गहरा इतना कि ऊपर के खेतों में खड़े आदमी को २ फिट दूर से यह न दिखे कि अन्दर कौन है |   इसी खोदरे के रस्ते सुबह शंकर आया था | धीरे से उस खोदरे में उतर कर शंकर ने इधर उधर देखा तो पाया की कुत्ता जो अभी तक उसके साथ चल रहा था अब नदारत है | दूर दूर तक कोई नहीं था | यहाँ वहाँ रह रह कर जुगनू चमक रहे थे और झींगुर प्रेमालाप कर रहे थे | शंकर ने सोचा जानवर है उसका क्या है, एक मन थोड़े ही रहता है | खोदरे की जमीन में पत्थरों की अधिकता थी, यहाँ नरम मिटटी नहीं थी| शंकर साइकिल पर चढ़ गया | आस्मां में बादलों के ठ्ठ के ठ्ठ आ गए थे | बादलों के पीछे से चाँद की रौशनी कुछ धुंधली और बिखरी हुई सी आ रही थी | हवा में ठण्ड बढ़ गयी थी लेकिन खोदरे के आस पास की जमीन के नीचे होने से शंकर का हवा से तो बचाव हो रहा था |  खोदरे के दोनों और खेतो के किनारों पर बबूल और नीम के पेड़, ऊपर आसमान पर पर्दा डाले हुए थे और बड़े बड़े पेड़ो का संरक्षण पा के उनके नीचे जंगली झाड़ झंकड़ उग आये थे|

 

शंकर अपनी मस्ती में मगन और थोडा उनींदा सा साइकिल पर चला जा रहा था | तभी खेत के किनारों पर  उगी हुई  झाड़ियो में उसे सरसराहट सुने दी | पहले तो उसे लगा की कोई साँप-वाँप  है | उसने पैडल तेजी से चलाना शुरू कर दिए |  सरसराहट की आवाज़ भी तेजी से आगे बढ़ने लगी | शंकर ने साइकिल धीरे कर दी, और वो जो भी था आगे निकल गया, आगे जा के झाड़ियो में कुछ जगह थी वहाँ पर वो आवाज़ रुक गयी | अब तक शंकर भी पूरी तरह रुक गया था, वो साँस थामे उसी जगह को देख रहा था जहां वो अवाजुक गयी थी| फिर से कुछ सरसराहट हुई और एक थूथन वहाँ से बाहर आया| देखते ही शंकर पहचान गया की यह तो वही कनकटा कुत्ता था जो उसके पीछे पीछे आ रहा था| शंकर ने एक गहरी सांस ली| कुत्ता खोदरे के अंदर उतर गया और शंकर से कुछ दूर ठीक उसके सामने खड़ा हो गया| वो सीधे शंकर की आँखों में देख रहा था | एक क्षण  के लिए तो शंकर  के शरीर में सिरहन दौड़ गयी, उसे लगा मानो ये मूक जानवर अब कुछ बोल पड़ेगा | शंकर इसके आगे कुछ समझ पता उससे पहले कुत्ता उसके पीछे की ओर आके खड़ा हो गया | शंकर ने इस सबको  भूलना ही बेहतर समझा और फिर से साइकिल पर पैडल मरने लगा|

 

बादलों से छन के आ रही पूर्णिमा के चाँद की मद्धिम रौशनी अब शंकर की पीठ पे पड रही थी | उसके पीछे चलने वाले कुत्ते की एक धुंदली सी परछाई शंकर को जमीन पर दिख रही थी | अब उसके मन में जल्दी से जल्दी घर पहुचने की योजना चल रही थी | यह खोदरा आगे जा कर  एक मौसमी नदी में मिल जाता था | गाँवों में हर चीज़ के अनेक उपयोग होते है | जब बरसात होती है तो यही खोदरा खेतो से पानी निकल कर नदी में पहुँचाता  था , और जब बरसात का मौसम चला जाता है तो येही खोदरा बैलगाड़ियों की आवाजाही के काम आता था | इसी प्रकार वो नदी जिसमे आगे जा कर यह जुड़ता था, बाकी मौसमो में एक सड़क का काम भी करती थी | शंकर के पास आगे जा कर दो रस्ते थे, या तो वो नदी पर कर के दूसरी तरफ की पगडण्डी से अपने गाँव जा सकता था, या फिर नदी के रस्ते सीधे अपने घर के पीछे निकल सकता था |  नदी का रास्ता छोटा था और वो सीधे उसे उसके घर तक ले जा सकता था,  मगर सूखी नदी के तल में साइकिल चलाना आसन काम नहीं है | पगडण्डी से जाने पर आसानी से साइकिल चलाई जा सकती थी| मगर लम्बा रास्ता होने के साथ साथ  पगडण्डी के रस्ते जाने में एक और परेशानी थी| वो परेशानी थी, रामकृष्ण का खेत| अपने गाँव में घुसने से पहले शंकर को रामकृष्ण के खेत से होकर गुज़ारना पड़ता | गांवे में मशहूर था कि रामकृष्ण ने अपनी जवानी में अपनी बीवी को इसी खेत पर ला कर मारा था | क्यों मारा, इसके बारे में कई बातें मशहूर थी, जितने मुंह  उतनी बातें| और इस सब के साथ यह भी मशहूर था कि उसी खेत में रात को रामू की बीवी की आत्मा भटकती है| रामू अब पागल हो चूका था, लोगो का कहना था यह भी उसकी बीवी की आत्मा का कमाल था|  जो भी हो अब रामू का खेत बंजर था और गाँव के बड़े से बड़े बाहुबली की हिम्मत नहीं थी कि वो रामू के खेत पर कब्ज़ा कर ले| शंकर के सामने दुविधा थी कि वो जाए तो किस रस्ते से जाए|

 

यही सोचते सोचते शंकर खोदरे के मुहाने तक आ गया, अंततः उसने पगडण्डी के रस्ते जाने का मन बना ही लिया | उसे किसी भूत वूत का डर नहीं था, बस वो नदी के  पथरीली तल पर साइकिल नहीं चलाना चाहता था | शंकर नदी पार करने लगा, कनकटा कुत्ता अभी भी उसके पीछे पीछे चल रहा था |  उसकी धुंधली परछाई अभी भी शंकर को जमीन पर दिख रही थी| नदी के तल में माहौल आस पास से शांत था | यहाँ झींगुरो की आवाज़ और  जुगनुओ की रौशनी नहीं थी|

 

शंकर अब यह सोच रहा था की जल्दी से जल्दी घर पहुँच जाए, माँ उसकी राह देख रही होगी| नदी के पथरीले तल पर साइकिल चलाना आसान नहीं था| फिर भी शंकर पुरे जोर से पैडल चला रहा था| अचानक वो कनकटा कुत्ता दौड़ते हुए उससे आगे निकल गया| आगे जा कर नदी में एक मोड़ था, वो कुत्ते उस मोड़ के बाद शंकर की दृष्टीसे ओझल हो गया| यह दूसरी बार था जब इस तरह कुत्ता, उसके अलग भाग निकला था| शंकर ने ज्यादा ध्यान न देते हुए अपने रस्ते चलते रहना ठीक समझा| जैसे ही शंकर ने नदी के साथ-साथ मोड़ लिया, उसे कुत्ता आगे खड़ा हुआ दिखा| कुत्ता ठीक उसी अंदाज़ में खड़ा था जैसा वो पिछली बार खड़ा था, उसकी आँखें शंकर को एकटक देख रही थी| शंकर को फिर लगा कि वो कुछ बोलेगा| शंकर अपनी गति से उसकी ओर बढ़ा| जैसे ही शंकर उसके पास पंहुचा, कुछ ऐसा हुआ जो देख कर शंकर के पैर जम गए| एक क्षण के लिए उसकी सांस रुक गयी ओर उसका मुंह फटा का फटा रह गया| उसने साफ़-साफ़ देखा कि उस कुत्ते ने शंकर से कुछ कहा| ठिठक कर रुके शंकर के मुंह से अनायास ही “क्या?” निकल पड़ा|
कुत्ते ने उस प्रश्न का उत्तर भी दिया| “इस रस्ते से मत जा| नहीं बचेगा” वो बोला|

शंकर को काटो तो खून नहीं, शरीर पर जैसे उसका अधिकार छीन लिया गया हो| आंखे फाड़े वो कुत्ते को देखता ही रहा, फिर उसके पैर कांपने लगे ओर साइकिल से वो गिर पड़ा| जब तक वो कुत्ता वहाँ से भाग चूका था| शंकर वहाँ पड़ा हुआ था, वो होश में तो था पर उसका दिमाग अचेत हो चूका था| कुछ लम्बी सांसे लेने के बाद जब उसके होश ठिकाने आये तो उसने पुनर्विचार किया| उसे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था कि कुछ ऐसा हो सकता है| उसने पढ़ा था कि कई बार अधिक थक जाने पर इस तरह के छलावे होते हैं| जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था, उसका इस वाकये पर यकीन कम होते जा रहा था| जल्द ही उसने इसे भूल कर आगे बढ़ने का मन बना लिया था, वो था तो बड़ा हिम्मती| मगर जो कुछ हुआ उसने थोड़ी देर के लिए उसकी हिम्मत को डिगा दिया था, उसके दिल में कहीं न कहीं एक भय घर कर गया था|

 

अभी भी नदी के तल में साइकिल चलते हुए वो यही सोच रहा था कि वो कुत्ता आखिर उसके साथ क्यों आया, ओर आखिर उसने उसे ऐसे बोला क्यों| अँधेरा और बढ़ गया था| कुछ देर पहले तक जो चाँद अपनी दुधिया रौशनी से नहला कर बादलो को कपास के फोए की तरह बना रहा था, अब उसकी रौशनी मद्धम पड़ने लगी थी| ग्रहण शुरू हो रहा था| रातों का अपना अलग जीवन होता है| झींगुर, जुगनू, गिरगिट, गीदड़, लोमड, चूहे जैसे कई जीव जो दिन में अपने-अपने ठिकानो में चुप जाते है, वो रात में खाने की तलाश में निकल आते है| इन सब में सबसे अजीब और घिनोना प्राणी होता है लकडबग्घा| मुख्यतः मरे हुए जानवरों के शवो से अपना भोजन जुटाने वाला यह जीव एक बेहद ही ख़तरनाक आवाज़ करता है| जो कई मील दूर तक सुनाई पड़ती है| कमज़ोर दिल वाले तो बस उससे ही डर जाते है| और अगर यह किसी के सामने आ गया तो, इसका अजीब रूप देख कर तो होश उड़ जाना पक्का है| आगे पैर पिछले पैरो कुछ बड़े होते है और गर्दन से लेकर पीठ पर घोड़े की तरह बाल|

रह-रह कर शंकर को लक्कड़बग्घों के रोने की भयावह आवाज़ शंकर के कानो में पद रही थी| जैसे जैसे वो आगे बढ़ रहा था, यह आवाज़ तेज़ और तेज़ होती जा रही थी| उसने अपने आप को लक्कड़बग्घों से सामने के लिए मानसिक रूप से तैयार कर रखा था| चाँद कि घटती रौशनी के साथ ही, रात कि आवाज़ें और तेज़ हो गयी थी| दूर कहीं, शंकर को कुछ आकृतियाँ चलती हुई दिखी, जिस तरह से वो चल रही थी, लग रहा था कोई जानवर ही है| चमगादड़ो का एक छोटा सा झुण्ड शकर के उप्पर से उड़ कर गया, एक चमगादड़ तो शंकर से बस बाल भर की दुरी से निकला| पास पहुचते हुए शंकर को यह साफ़ हो गया कि वो आकृतियाँ लक्कड़बग्घों की थी|
कहीं से उन्हें मारा हुआ कोई जानवर मिल गया था, जिसको वो चीथड़े-चीथड़े कर खा रहे थे| शंकर की साइकिल की आवाज़े सुनते ही वो सतर्क हो गए| वो रुक कर शंकर की ओर देखने लगे| शंकर ने तो पहले से ही इस सामने के लिए खुद को तैयार कर रखा था| वो बिना रुके उनकी ओर बढ़ रहा था| कुछ देर शंकर को देख कर लक्कड़बग्घों को समझ आ गया था कि शंकर रुकने वाला नहीं था| यह समझते ही उन्होंने वहाँ से भागने में ही भलाई समझी| अजीब से, किसी पागल के हंसने के सामान आवाज़ करते हुए, वो वहाँ से भाग निकले|

शंकर उन पर ध्यान न देते हुए आगे बढ़ना चाह रहा था, मगर  के कोने से उसको कुछ ऐसा दिखा कि वह ठिठक गया। जिस जानवर को वो लक्कड्बग्घे नोच नोच कर खा रहे थे वो वही कनकटा कुत्ता था। पहले तो शंकर को विश्वास नहीं हुआ, क्यूकि कुत्ता तो  उलटी दिशा में गया था। और तो और उसने लक्कड्बग्घो और कुत्ते के बीच किसी संघर्ष की आवाज़ भी नहीं सुनी। लेकिन उस क्षत-विक्षत शव का सर, जो एक बाबुल के पेड़ के नीचे पड़ा था, उस सर का भी कान ठीक उसी तरह कटा हुआ था जैसा की उस कुत्ते का था । शंकर की साँसों की गति तेज़ हो गयी थी। उसका ह्रदय जो बड़ी बड़ी मुश्किलों को झेल गया था, अब थोडा डिगने लगा था। वो मूर्ति के सामान खड़ा हो कर उस शव को देख रहा था, कि अचानक कही दूर कोई उल्लू बोलने लगा। उल्लू की इस ध्वनि ने शंकर की धुन को तोड़ दिया। शंकर ने पाया कि उसका कुरता पसीने में पूरी तरह भीग गया था। हवा तो अब पहले से भी ठंडी चल रही थी, लेकिन शंकर के सर से तो किसी बरसाती झरने की तरह पसीना चू रहा था। ग्रहण अब अपने चरम पर था, सोमदेव रहू के पाश में करीब करीब कैद हो ही चुके थे।

ग्रहण का सम्बन्ध भारतीय मान्यताओं में कभी भी सुखद कहानियो से नहीं रहा है। आज भी कई घरो में ग्रहण छुट जाने के बाद शुध्दिकरण की क्रियाएँ संपन्न की जाती है। मगर शंकर नए विचारो वाले भारत का नागरिक था, ऐसी पुरातनपंथी मान्यताएँ उसको मंज़ूर नहीं थी। यह रात उसके इन विचारों की परीक्षा की रात थी। पार्श्व से निरंतर एक ताल में आती उल्लू की आवाज़ अब अँधेरी हो चली रात को एक स्थायित्व प्रदान कर रही थी। आसमान में बादलों  के पीछे के उस सफ़ेद गोले को पृथ्वी की परछाई ने पूरी तरह ढँक लिया था। रात का तीसरा  पहर शुरू हो रहा था। भूत प्रेत के किस्से सुनाने वाले लोगो को इसी पहर में सबसे ज्यादा पारलोकिक अनुभव होते है, क्यूंकि इस पहर में  ही रात सबसे गहरी होती है।

 शंकर के पेर साइकिल पर लगातार एक मशीन की भाँति चल रहे थे। उसने अपने अन्दर की सारी उर्जा, साड़ी शक्ति और साड़ी हिम्मत को इकठ्ठा कर अब बिना किसी पथांतर एक लक्ष्य की और बढ़ने की ठान ली थी। अँधेरी रात में खुद ही के भरोसे यह नौजवान आगे और आगे बढ़ता ही जा रहा था। उसका शरीर पैडल चलने की एक लय में आ चूका था। साइकिल के चैन कवर से रगते हुए पेडल आवाज़ एक नियमित ताल में आ रही थी। पहले से आ रही उल्लू की आवाज़ अब दूर और दूर होती जा रही थी। शंकर को महसूस होने लगा कि अब शायद कुछ विचित्र, कुछ अजीब नहीं होगा। लेकिन शायद भाग्य को ऐसा मंज़ूर नहीं था, अगला पैडल मरते ही शंकर की साइकिल की चैन उतर गयी और उसने अपना संतुलन खो दिया। वो पगडण्डी के किनारे वाले खेत में जा गिरा। और उसके दुर्भाग्य को शायद सिर्फ इतने से संतोष नहीं हुआ, कि आसमान में एकत्रित मेघों ने वर्षा का सूत्रपात कर दिया।

एक पल को तो शंकर झुंझला ही गया, उसे लगा कि वो क्या कर जाए। शायद इससे बुरी रात उसके जीवन में पहले कभी नहीं आई थी। धरा पर बरसती पानी की बूंदों के शोर ने आस पास की सारी आवाजों पर एक पर्दा सा दाल दिया। शंकर कीचड से भरी उस ज़मीन पर खड़ा अपने खोये दिशा ज्ञान को पुनः स्थापित करने की कोशिश करने लगा। उसे तो यह भी पता नहीं था कि उसकी साइकिल कहाँ पर गिरी थी। बारिश के साथ तेज़ हवा भी चलने लगी, अब शंकर के सामने समस्या यह थी कि ऐसी बारिश में वही रुक रहे या आगे बढ़ने का जोखिम उठाये। रुके रहना तो उसे वैसे भी मंज़ूर नहीं था, तो उसने अंदाज़े से साइकिल दूंदने की कोशिश शुरू कर दी। काफी देर कीचढ़ में टटोलने के बाद साइकिल का पहिया उसके हाथ में आया। उसने अँधेरे में ही साइकिल की चैन वापस चढ़ाई और उसपर सवार हो गया। पगडण्डी पर कीचड तो काफी हो गया था, अब शंकर को पहले से कंही अधिक जोर लगाना पड़ रहा था। उसकी गति मंथर हो चली थी। शंकर अब अपने हर उस फैसले को कोस रहा था जिसके चलते वो इस वक़्त इस हाल में था। तभी उसको वो वाकया याद आया, जब उस कनकटे कुत्ते ने उसे इस रास्ते जाने से मन किया था। उस बात को तो शंकर एक भ्रम मान कर भुला चूका था, लेकिन शायद उसी भ्रम ने शंकर को एक चेतावनी जरूर दी थी।

बारिश अब थोड़ी थम सी गयी थी। और शंकर की ख़ुशी का तब ठिकाना नहीं रहा, जब उसने दूर एक लालटेन जलती हुई देखी। उसी पल शकर ने निर्णय कर लिया कि जैसे भी हो हाथ पैर जोड़ कर आज रात वो यही आसरा ले लेगा। उसने साइकिल रौशनी की दिशा में मोड़ दी।

“भाई कोई है?” शंकर ने पूछा

जहाँ  लालटेन तंगी थी वही एक पुरानी झोपडी थी, जो एक खाली खेत के बीचोबीच बनी हुई थी। अन्दर से हल्का-हल्का धुँआ भी उठ रहा था। कुछ देर रुकने पर भी जब किसी का जवाब नहीं आया तो शंकर दुबारा आवाज़ लगाई। लेकिन परिणाम वही रहा। शंकर ने दरवाज़े को जब हलके से धक्का दिया तो दरवाज़ा खुल गया। अन्दर कोई नहीं था, बस एक छोटा सा दीपक चूल्हे के पास जल रहा था। चूहे पर एक बर्तन रखा था और नीचे एक थाली में दो रोटी। भूख तो शंकर को बड़े जोरो की लगी थी। और सामने थाल सजा था, मगर उसका शिष्टाचार उसे इस बात की इजाज़त नहीं दे रहा था कि वो किसी के घर में घुस कर बिना पूछे कुछ खा ले।

शंकर चूल्हे के नज़दीक झोपडी के उस गर्म कोने में बैठ गया। दिन भर की भागदौड़ और रात की घटनाओ से उसका शरीर और मन दोनों थक चुके थे। उसने अपने कुर्ते की जेब में हाथ डाल कर भैंस की दावा की शीशी का होना सुनिश्चित किया। यही वो चीज़ थी जिसके लिए उसने सारी  मुसिबत  मोल ली थी। उसने खुद को दिलासा दिया कि अगर वो सुबह सूर्योदय के साथ ही निकल पड़ता है तो सुबह के चारे के साथ वो भैंस को दावा खिला सकता है। इसी  उधेड़बुन में उसे नींद कब लग गयी उसे पता भी नहीं चला।  शायद शंकर के लिए इस रात का सबसे सुहाना पल वही था।

…शेष अगले भाग में/To be continued

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