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Book review : आज़ादी मेरा ब्रांड – अनुराधा बेनीवाल

वैसे तो मैं कोई पेशेवर समीक्षक तो हूँ नहीं| अजी पेशेवर तो छोडिये, शौकिया भी नहीं हूँ| तो फिर किस क्षमता से मैं ये रिव्यु लिख रहा हूँ? सच कहूँ तो कोई भी नहीं| क्युकी इस किताब को निकले ज्यादा वक़्त नहीं हुआ है, और इन्टरनेट पर अभी तक ज्यादा रिव्युस नहीं आये हैं, मैंने मौका देख कर रिव्यु लिख डाला, शायद अपना ब्लॉग इसके चलते ही चल जाए! और फिर एक आम पाठक ही वो आम पाठको वाला रिव्यु दे सकता है न….

अगर आपने स्वदेस फिल्म देखी है तो आपको उस फिल्म का वो सीन ज़रूर याद होगा, जब मोहन(शाहरुख़ खान का किरदार) से गाँव वाले अमेरिका के बारे में पूछते है और जैसे ही मोहन अमेरिका के बारे में अच्छी बातें बताना शुरू करते है गाँव वाले उनसे वितर्क करते है| और फिर एक ताऊ कहते है कि हमारे पास कुछ ऐसी चीज़ है जो किसी और के पास नहीं हो सकती – संस्कार और परंपरा| और फिर वो ये कहते हुए वहाँ से उठ के चले जाते है कि भारत दुनिया का सबसे महान देश था, सबसे महान है और सबसे महान रहेगा| और ये सीन मेरे लिए उस फिल्म का सार था| हम भारतीयों में खुद की कमियों या गलतियों को अस्वीकार करने की जो प्रवृत्ति है वो हमारे बेहतर होने की कोशिशो को बेअसर कर देती है| उस सीन का मेरे मन पर एक चिरस्थायी प्रभाव या अंग्रेजी में कहे तो लास्टिंग इम्प्रैशन रह गया| और अनुराधा की किताब ‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ भी कुछ ऐसा ही प्रभाव छोड जाती है|

‘आजादी मेरा ब्रांड’ कहने को तो एक अकेली भारतीय लड़की की यूरोप ट्रिप का यात्रा वृतांत है, लेकिन ये कितने सारी सतहों पर उससे कहीं ज्यादा हो जाता है| सिर्फ यात्रा-वृतांत कह देना इस किताब के पोटेंशियल को क्षीण करके दिखाना होगा| अनु की यात्रा जितनी सतह के उप्पर है उससे कही ज्यादा उसके भीतरी भी है, एक आइसबर्ग की तरह| और सच में अनुराधा(जिन्हें मैं अपने आलस्य के चलते आगे ‘अनु’ कहूँगा) एक ऐसी घुमंतू है जो बिना किसी लाग-लगाव, दुराव-छुपाव अपने हिसाब से हर नए अनुभव को एक बालिका की मासूमियत से आपसे अपनी कलम के ज़रिये साझा करती जाती है| वैसे तो मैं कोई अथॉरिटी नही हूँ उनके या किसी के भी साहित्य पर टिपण्णी करने के लिए, लेकिन ये मेरे अभी तक के पढ़े किसी भी यात्रा वृतांत से बिलकुल अलग है| क्यों अलग है, कैसे अलग है ये कुछ तो मैं लिख के बता सकता हु और कुछ आपको खुद पढ़ के जानना होगा|

सबसे पहली बात तो ये कि अनु की लेखनी सकारात्मक उर्जा का एक धमाका है| पढ़ते वक़्त न जाने कितने ऐसे क्षण आये कि मैं खुद को मुस्कुराने से रोक नहीं पाया| अनु की लेखन शैली बेहद ही सहज है, वो बिलकुल भी साहित्यिक लगने की कोशिश नहीं करती| लेकिन कोई कुशल संगीतकार या कोई कुशल बारटेंडर जिस तरह उपयुक्त चीजों को सही मात्रा में मिला कर आपको मुघ्द कर देता है ठीक उसी तरह अनु भी आपको अपनी बातो के मधुर कॉकटेल से बंधे रखती है| इस किताब को पढ़ते-पढ़ते कितनी दफा तो मैं ये ही भूल गया कि मैं एक किताब पढ़ रहा हूँ| अनु के ऑब्जरवेशन और खुद से संवाद इतने व्यापक, इतने रेसोनेंट है कि पढ़ते हुए कितनी बार तो आपको ऐसा लगेगा कि शायद ये किताब आपने ही लिखी है या अनु ने आपका दिमाग पढ़ के लिख डाली है| कम से कम मुझे तो कई बार ऐसा लगा| जैसे की – नदी का रास्ता पकड़ कर शहर घुमने का नुस्खा, पेशाब न कर पाने की मुसीबत, भाषाई रूप से खुद को अनाथ महसूस करना, हिंदी-अंग्रेजी के बीच हर दिन चल रहा द्वन्द, अर्रेंज मैरिज का कांसेप्ट न समझ पाना, पूर्वी और पश्चिमी सभ्यता के टकसाली ढांचे की वैधता, भारतीय समाज में लडको और लडकियों को एक उम्र तक अलग अलग करके रखना| लिस्ट बोहोत लम्बी है, जनाब!

पूरी किताब का सबसे रोचक हिस्सा या हिस्से रहे अनु के विविध प्रकार के होस्ट्स| फिर चाहे वो प्राहा के कम्यून रूपी घर के फ़क़ीरनुमा होस्ट, या बर्लिन के नौकरीपेशा मध्यम वर्गीय आम शेहरी| ये अनुभव पढ़ कर आप सोचने पर मजबूर हो जाएँगे कि कैसे कोई किसी अजनबी के लिए अपने घर के दरवाज़े बिना किसी शक-शुबे के खुल सकता है? और घर के दरवाज़े खोल देना बस घर तक ही सीमित नहीं रह जाता न| चंद दिनो के लिए होस्ट मेहमान का और मेहमान होस्ट की ज़िन्दगी का हिस्सा ही बन जाता है| सच कहू तो हमारे समाज में तो आजकल रिश्ते-नातेदार भी इतनी आत्मीयता और सहजता से अपने सगे संबंधियों को ओने घर में, जीवन में प्रवेश नहीं देते| हो सकता है रिश्ते-नातो के पूर्वपरिभाषित नियमो का अभाव ही इस तरह के मेल-जोल को जन्म दे सकता है| अनुराधा की एक होस्टेस के उनकी माँ से खट्टे-मीठे सम्बन्ध के बारे में पढ़ कर तो शायद ऐसा ही लगता है| हर रिश्ता अपने आप में अलग है, क्युकी हर माँ एक अलग शाख्सियत और और हर बेटी एक अलग| क्यों हम इन रिश्तो को एक ही सांचे में ढाल कर देखना चाहते है?

इसी तरह के कई प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष सवाल पूछते हुए अनु पढने वाले को यूरोप के एक अलग चेहरे से पहचान कराती चलती है| इस सबसे उप्पर इस किताब में सबसे अहम एक नैरेटिव है – भारतीय समाज में महिलाओं को मिलने वाली आज़ादी| और इस पुरे नैरेटिव को समेटता हुआ अंत में है अनु का भारतीय लड्कियो के नाम एक बेहद प्रोत्साहक सन्देश| लेकिन शायद यही इस किताब से मेरी सबसे बड़ी शिकायत है(दूसरी शिकायत अंत में बताऊंगा)| इस किताब का असल सन्देश सिर्फ भारतीय लडकियों के लिए ही नहीं वरन भारत के हर युवा के लिए है| सबसे पहले तो इस लिए कि जितनी ज़रुरत लडकियों को अपनी आज़ादी क्लेम करने की है उतनी ही ज़रुरत लडको को ये जानने-समझने की है कि समाज का दूसरा हिस्सा उनसे क्या अपेक्षा रखता है| ये किताब एक बहुत अच्छा वाहन है नौजवानो के ये समझने के लिए कि वो क्या सब है जिससे हम अपने समाज में लडकियों को वंचित रख रहे है| अनु के संस्मरण भरे पड़े है ऐसे कई मर्दों से जो कही न कही ऐसा माहौल बनाने में मदद करते है जिसमे कोई भी व्यक्ति, मर्द या औरत, निर्भीक हो कर अपने आप को व्यक्त कर सके| ये आइना है हमारे लिए और हमारे समाज के मूल्यों के लिए| अनु जब पेरिस में अपनी भारतीय सहेली के घर की हिपोक्रिसी को बेपर्दा करती है तो वो सिर्फ एक दंपत्ति को ही नहीं, हमारे पुरे समाज को कटघरे में खड़ा कर देता है| और इसी तरह मध्य पूर्व से आये प्रवासियों में भी महिलाओ को असमान अपेक्षाओ का होना कही न कही भारतीय समाज में मौजूद वैसी ही मान्यताओ को प्रश्न करता है| हमारे नेता और निति निर्माता हमेशा जात-पात के चलते समाज में रहे शोषण और दमन को लेकर तो हर तरह का शोर मचाते है पर एक भेदभाव जो समाज के हर तबके और हर जाती में साफ़ तौर पर पाया जाता है, उसे सामाजिक व्यवस्था या नियम मान कर नज़रंदाज़ कर दिया जाता है| ये हमारा ढोंग, हमारी हिपोक्रिसी नहीं तो और क्या है कि एक तरफ तो हम सबको बराबर का मौका देने की बात करते है और दूसरी तरफ आज भी महिलाओ को धर्मस्थल में प्रवेश के लिए भी आन्दोलन करना पड़ता है| सरकारें इस आन्दोलन के विरुद्ध कोर्ट में केस तक कर देती है| और हिपोक्रिसी को चुनौती सिर्फ मर्द-औरत के बीच की दुरी के मुद्दे तक सीमित नहीं है| कई जगह अनु हमारे खुद को पश्चिम से आध्यात्मिक तौर पर बेहतर होने या संस्कारो में रिच होने के दंभ भरने की प्रवृत्ति को भी चुनौती देती है और वो भी पुरे साक्ष्य के साथ| लेकिन क्या ये सच हो सकता है? हम जो की खुद को विश्व गुरु बुलाते है, भला किसी से आध्यात्म में पिछड़ सकते है? ये और ऐसे कई सवाल है जिन पर चिंतन करना हमारे लिए बहुत ही ज़रूरी है| खैर मुद्दे पर वापस आते है, दूसरा कारण कि ये किताब सिर्फ लडकियों के लिए प्रेरक नहीं वो है उस मेंटल कंडीशनिंग को चुनौती देना जो हमे बचपन से किसी चीज़ को बिना जाने बिना समझे उसके बारे में मत बना लेना सिखा देती है| कही न कही हमारे समाज में, हमारी परम्पराओं में शुरू से बच्चो के मानसिक अनुकूलन कर देने का चलन है| जहां एक बच्चे को अपने जूते के फीते तक ढंग से बंधना नहीं आते, वहाँ उसे ये सिखा दिया जाता है कि बीस साल बाद उसे क्या बन जाना है| उसे ये घुट्टी में पिला दिया जाता है कि क्या अच्छा और क्या बुरा है| स्कूल की किताबो के साथ-साथ, छद्म रूप से उसे एक और किताब का पाठ दिया जाता है – समाज की नियमावली या सोशल रुलबूक|  मुझे ये बताने की कतई ज़रुरत नहीं है कि किस खूबसूरती से अनु अपने वृतांत में हमारे समाज की इस टेंडेंसी को आइना दिखा देती है| वो अपनी किताब के हर अध्याय के साथ उस रुलबूक को पुर्जा-पुर्जा करके विसर्जित करती जाती है| वो हर नए अनुभव को उसकी योग्यता पे आंकती है, बिना किसी पूर्वाग्रह के| और यहाँ अनु के विचारो में न तो कोई ‘colonial baggage’ है जो यूरोप पे लिखने वाले अधिकतर भारतीय लेखको की किताबो में मिलता है, जिसमे की अंग्रेज़ ही हो जाने की चाह हो और न ही ‘मेरा भारत सबसे महान’ वाली विचारधारा का कोई अंश है| वो तो बस इस यात्रा को अनुभव कर रही है| लेकिन वो अपनी इस यात्रा के दौरान हर मोड़ पर अपने मन को टटोलती है और खुद से, हमारे समाज से कई ऐसे सवाल पूछती है जो हमे असहज कर सकते है|

हर समाज का किसी मनुष्य की ही तरह मेचुरिटी लेवल होता है| लोकतंत्र को अपनाने के लिए भी समाज को एक स्तर तक मेचुर होना पड़ता है, जिस तरह गाडी चलाने का लाइसेंस एक उम्र के बाद ही मिलता है| हर कोई अपनी ही गलती से सीखता है| जिस तरह चलते हुए गिरने पर कोई बच्चा फिर कोशिश करता है, गलती सुधारने की उसे बेहतर करने की, अनुराधा भी हमारे समाज के लिए वही कोशिश कर रही है| हाँ इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत में सभ्यता आदि काल से है और हमारे समाज में कई ऐसी चीज़े है जो बहुत अच्छी भी है| मगर इस बात में भी कोई दो राय नहीं होनी चाहिए कि हमारा समाज आधुनिक काल में अपनी धुरी खोज रहा है| और इसके लिए प्रमुख कारण है परिवेश का बदल जाना| एक समाज जो कि सदियों तक राजा-महाराजाओं का दास रहा, जिसको हर नियम एक आदेश स्वरुप थोंप दिया जाता था, आज अपने नियम खुद बना रहा है| जहां कोशिश ये है कि हर किसी को अपने विचार रखने की पूरी आज़ादी हो, वहाँ कई तरह की विचारधाराएँ एक साथ होना लाज़मी है| अब ये समाज के उप्पर है कि इस तरह की डाइवर्सिटी को वो कैसे हैंडल करता है| अगर वो किसी नासमझ टीनएजर की तरह बर्ताव करे तो वो होगा जो आज हमारे समाज में हो रहा है – टकराव| और अगर किसी समझदार तीस की उम्र को छुते हुए व्यक्ति की तरह बर्ताव करे तो वो होगा जो होना चाहिए| लेकिन जनाब समझदारी तो आते-आते ही आती है, या यु कहे इसे लाना पड़ता है| कैसे? अपनी गलतियाँ पहचान के, उनसे सीख के| ये समझ के कि इतनी सारी जो विचारधाराएँ है उनमे से सबके लिए सुगम कौनसी है| और अपनी इस किताब के साथ, जाने-अनजाने अनुराधा एक्सेक्ट्ली यही कर रही है|

अंत में बची हुई दूसरी शिकायत! किताब के अंतिम दो चैप्टर थोड़े जल्दी समेटे हुए लगे| जिनको पढ़ते हुए एक अधूरी चाह सी रह गयी| जैसे चार रसगुल्लो की जगह तीन दशमलव नौ शुन्य ही खाने को मिले| लेकिन हो सकता है ये पहले के कुछ चैप्टर्स के अत्यंत प्रभावी होने के कारण हुआ हो|

‘आज़ादी मेरा ब्रांड’ ऑनलाइन आर्डर की जा सकती है, इस लिंक पे|

 

 

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