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झील

एक झील है यहीं पास में

तेरी आँखों से गहरी और मेरे अरमानो से ज्यादा थकी हुई

किनारे उसके टहलने चला जाता हूँ कभी

वो जो गाना था हम साथ में गुनगुनाते थे

पत्थर बाँध कर उसी झील में फेंक आया हु|

 

यूँ  घबरा मत, वहां हो महफूज़ है|

झील के ताल में धरा है|

पापा के स्कूटर, लकड़ी-गारे के पुराने घर, दादी की कहानियो, नाना के पेड़ो, माँ के गुर्दे और दोस्तों की साइकिल से निकली हवा के साथ|

 

वैसे तो गोता भी मैं ठीक-ठाक लगा लेता हूँ

पर इस झील में कम ही लगता हूँ|

अन्दर जाने के ख्याल से ही सांस रुक सी जाती है|

 

लेकिन आज बात कुछ अलग सी हो गयी है|

अब तू आ ही  गयी है, न चाहते हुए गोता तो मैं लगाऊंगा ही

 

पता नहीं फिर कब बदन सूखेगा?

पता नहीं कब मैं उबर पाउँगा?IMG_4772.JPG

 

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