चंद्रग्रहण – २

मीठे नींद में डुबे शंकर के आनंद में तब खलल आ गया जब उसके चेहरे पर हलकी हलकी पानी की फुहार आने लगी। आधी कच्ची आधी पक्की नींद में जब उसने आँखे खोली तो देखा कि झोपडी की खिड़की खुली हुई है और उसमे से हवा के साथ बारिश का पानी भी अन्दर आ रहा है। नींद टूटने से शंकर थोडा  सा झुंझला सा गया था। उसने जैसे ही खिड़की बंद करने के लिए उठना चाहा, बाहर टंगे लालटेन की ज़मीन पर पड़ती रौशनी में उसे एक परछाई दिखी। और अगर वो एक साधारण परछाई होती तो शायद शंकर की सांस ऊपर की ऊपर और नीचे की नीचे नहीं रुक जाती। परछाई एक लाश की थी जो झोपडी के छप्पर से लटक रही थी, हवा उस लाश को अपने साथ दाये-बाए हिलाए जा रही थी । कुछ क्षणों के लिए शंकर समझ न पाया कि क्या करे! फिर उसने धीरे से खुद को खिड़की के पास खिंचा तो पाया कि जो छप्पर से लटक रही थी वो कोई लाश नहीं थी। बल्कि किसी ने खेत से ला कर काकभगोडे को टांग दिया था।

“कोई पागल ही ऐसा कर सकता है!” शंकर ने बुदबुदाया

शंकर अब भी आश्चर्यचकित था, मगर अब उसके दिल से वो दहशत जा चुकी थी जो परछाई को देखते ही उसे महसूस हुई थी। वो आस पास का जायजा लेने जब पीछे मुड़ा तो उसने पाया की चूल्हे पर रखा वो बर्तन गायब है। उसकी समझ में आ गया कि जब वो सो रहा था, जरूर झोपडी का मालिक वापस आया होगा। काकभगोडे को टांगने वाली करतूत भी हो न हो उसी की होगी। शंकर उसे धुन्धने झोपडी के बहार आ गया। हवा अब और उग्र हो चली थी। लालटेन की लुपझुप करती लौ देख शंकर को दिए और तूफ़ान वो पौराणिक संघर्ष याद आ गया। जाने क्या सोच कर उसके परेशान चेहरे पर हल्की सी मुस्कान आ गयी।

शंकर ने उस काकभगोडे को नीचे उतरने के लिए जब पकड़ा तो देखा कि काकभगोडे के आँख, नाक और मुंह बना दिए गए थे। जिस लाल रंग से उन टेढ़ी मेढ़ी आकृतियों को बनाया गया था वो अभी तक सुख भी नहीं था। शंकर ने काकभगोडे  को उतार कर ज़मीन पर धर दिया। ओटले के किनारे पर ही वो बर्तन भी रखा था जो पहले शंकर ने चूल्हे पर रखा देखा था। जब शंकर ने ध्यान से देखा तो पाया बर्तन में अभी भी कुछ रखा हुआ था, पास जाने पर उसने जो देखा उससे उसे एक लघु हृदयाघात आ गया। बर्तन के अन्दर एक कुत्ते का सर था। शंकर वही का वही ज़मीन पर बैठ गया। यह सब क्या हो रहा था उसकी कुछ समझ में नहीं आ रहा था। उसकी तार्किक शक्ति उसका साथ छोडती सी मालुम हो रही थी। जो कुछ आज रात उसके साथ हो रहा था, उस सब की व्याख्या शायद ही कोई विज्ञान दे सकता था। पर यह सब हो तो रहा था, वो चाहे मने या न मने। कुत्ते का सर देखते ही उसे लगा था की ये उसी कनकटे कुत्ते का सर होगा। न जाने क्यों आज रात घूम फिर कर शकर का सामना उस कनकटे कुत्ते से हो रहा था।

उसने हिम्मत जुटा कर अपने दर की पुष्टि करने के लिए ज्यो ही बर्तन में झाँका, एक अशांत से अट्टाहस ने उसकी रूह को कंपा दिया। कुत्ते का कान तो कटा हुआ ही था, लेकिन यह हंसी किसकी थी। पहले तो उसे लगा कि लक्कड्बग्घो की आवाज़ है, लेकिन तुरंत ही उसका यह कयास असत्य सिध्द हो गया। सामने से एक अधनंगा व्यक्ति हाथ में कुल्हाड़ी लिए पागलों सी चाल में शंकर की तरफ बढ़ा जा रहा था। वो पागल आसमान को ताकता बेतरतीब सा शंकर के बिलकुल पास आ गया। जब शंकर ने ध्यान से देखा तो पाया कि वो तो पागल रामकृष्ण ही था। तो क्या वो अपने गाँव के इतना करीब आ गया था, कि रामकृष्ण के खेत में पँहुच चूका था? रामकृष्ण को देख उसके खोये होश वापस आये। मगर कुत्ते के सर को पकाने का वाली बात उसके समझ न आई। रामू पागल तो था पर ऐसी हरकते गाँव में तो नहीं करता था।

“तूने उसे बचा लिया?” रामकृष्ण ने चीखते हुए शंकर से पूछा

 

“किसे?”

“इसे, तेरी भाभी को।” पगले ने काकभगोडे की और इशारा करते हुए बोल

“अरे, ये लक्ष्मी भाभी नहीं है। बस एक काकभगोडा है, बस। लक्ष्मी भाभी तो मर चुकी है ना ।” उसने रामू को समझाने की कोशिश की

यह सुनते ही रामू फिर अपने भयावह अंदाज़ में हँसने लगा।

“तू भी बाकी सब की तरह पागल हो गया है, शंकर” उसने कहा

यह सुन कर शंकर को क्षण भर के लिए हँसी आ गयी। खुद पागल हो कर यह पगला मुझे पागल बोल रहा है। उसने सोचा कि जाने दो इससे बहस करके कोई फायदा नहीं है, मैं कुछ करके यहाँ से निकलता हूँ।

“माफ़ कर दे भाई, मैं इसे वापस टाँग देता हु” कहते हुए शंकर ने काकभगोडे को वापस छप्पर पर टाँग दिया

रामू सर हिलाने लगा। “अब कोई फायदा नहीं। वो तो चली गयी ना।” इतना कहते कहते रामू ने शंकर का हाथ पकड़ लिया। शंकर पूरी तरह सतर्क हो चूका था। वो रामू की और से आने वाले किसी भी प्रकार के हमले के लिए तैयार था।

“चल, आ मैं मिलवाता हु तुझे उससे।” रामू ने उसे खींचते  हुए कहा

“नहीं नहीं, मैं घर जाता हूँ ” उसने कहा 

“नहीं” रामू चिल्लाया “अब तू नहीं जा सकता, वो तुझे जाने नहीं देगी, इतना आसान नहीं है।”

शंकर रामू के ऐसे बर्ताव को देख कर घबरा गया। इसके पहले रामू को कभी इतना उग्र उसने नहीं देखा था। सीधा सादा रामू, गाँव में रोज सुबह हर आने जाने वाले को ‘राम-राम’ करता था। गाँव के बच्चे उसका मज़ाक बनाते कभी उसका सामान छुपा देते तो कभी उसके पीछे टिन के खाली डब्बे बांध देते। मगर रामू बस उन उत्साहित बच्चो को देख कर हँसता रहता। लोग ज़रूर कहते थे कि कई साल पहले उसने अपनी बीवी, लक्ष्मी को मार दिया था। लेकिन शंकर को इस बात पर मुश्किल से ही यकीन होता था।

रामू अब शंकर को खींचता हुआ अँधेरे में ले जाता जा रहा था। शकर ने हाथ चुदने की पुरजोर कोशिश की पर न जाने कहाँ से उस पागल में उतनी शक्ति आ गयी थी कि शंकर जैसा हट्टा-कट्टा युवक भी हाथ नहीं छुड़ा पा रहा था।

इससे पहले कि वो कुछ समझ पता, रामू उसको एक आम के पेड़ के पास ला चूका था।

“यही रहती है वो। रोज़ मुझे यहाँ बुलाती है।” आँखें मटकाते हुए रामू ने हौले से शंकर के कान में कहा

“वो जो घर में खाना था न, इसी के लिए बनाया था। इसी बहाने तो इसको घर तक लाया था। पर तूने उसे भगा दिया। नालायक।” ये कहते हुए रामू की आँखें अंगारों की तरह जल उठी, नथुने फूल गए। पूरी रात में पहली बार शंकर बुरी तरह से डर चूका था। उसने अपने हाथ को एक झटके से रामू की पकड़ से छुड़ा लिया।

“वो देख” रामू ने लालटेन पेड़ की ओर की और अजीब सी भाषा में कुछ बोलने लगा। पेड़ उन दोनों से कुछ गज की दुरी पर था, अँधेरे में लालटेन की रौशनी जैसे ही पेड़ पर पड़ी कुछ सरसराहट सी हुई। शंकर न चाहते हुए भी उस ओर देखता रहा। पत्तो की आड़ में शंकर को दो आंखें दिखी, जो लालटेन की रौशनी से टिमटिमाने लगी थी। बिना कुछ सोचे शंकर वहाँ से भाग। पीछे से रामू के चिल्लाने की आवाज़ आ रही थी। कुछ दूर जा कर जब उसने देखा तो रामू पेड़ पर  अंधाधुंध कुल्हाड़ी मार रहा था। उसने वहाँ से भाग जाना ही बेहतर समझा। जैसे जैसे वो दूर जाता जा रहा था, रामू की आवाज़ हलकी और भ्रामक होती जा रही थी। उसे लगा कि रामू किसी से झगडा कर रहा था, शायद किसी महिला से।

बेतहाशा भागता हुआ शंकर वापस रामू की झोपडी पर आ पंहुचा। उसने अपनी साइकिल ली और बिना वक़्त गंवाए रवाना हो गया। बारिश तो अब थम चुकी थी, ग्रहण भी छुटने को था। चन्द्रमा की हलकी हलकी दुधिया रौशनी से थोड़ी दृष्टता लौट रही थी। शंकर अपनी पूरी उर्जा से पैडल चला रहा था। भूख प्यास से बेहाल हो चुके उसके शरीर में अब कुछ ख़ास ताक़त बची नहीं थी। ये तो उसका निश्चय ही था जो उसे जिलाए हुए था। आँखों की पलके अब कई मनो के भार के नीचे दबती जा रही थी और सोचने की शक्ति अब क्षीण हो चुकी थी।

एक बार फिर शंकर को दूर कुछ रौशनी सी दिखाई पड़ी। वो उस ओर बढ़ चला। लेकिन इस बार वो सतर्क था, कि कही फिर किसी सरफिरे के घर न पहुच जाए। झोपडी के बाहर लालटेन आँगन में रखी हुई थी। जैसे ही उसने झोपडी के बाहर साइकिल रोकी, अन्दर से एक चितपरिचित आवाज़ उसे सुनाई पड़ी। इसमें कोई शक न था कि वो आवाज़ रामू के हंसने की थी। मगर शंकर को इस बात पर अब भी विश्वास न हुआ। वो जब रामू की झोपडी से निकला था, तब से अभी तक उसने नाक की सीध में ही साइकिल चलायी थी। घूम कर वापस वह पहुचने का तो सवाल ही नहीं उठता था। इतना सब हो जाने के बाद भी उसके अन्दर कहीं एक तार्किक जीवित था। वो साइकिल रख कर दरवाज़े की ओर बढ़ा।

“मैंने कहा था, कि इतना आसान नहीं है।” रामू ने अंदर से अट्टाहस करते हुए कहा

शंकर की नींद अब पूरी तरह उड़ चुकी थी। उसने साइकिल उठाई, फिर से उसने पूरी ताकत से पैडल चला शुरू कर दिए। वो यही सोच रहा था कि अगर इस दिशा में जा कर वो वापस शंकर के घर पहुचता है तो शायद वो सीधे नहीं एक चक्कर में जा रहा है। इस बार उसने इस बात का ख्याल रखा कि वो साइकिल सीधी, बिलकुल सीधी चलाये।

काफी देर बाद, उसे फिर से एक झोपडी दिखी। वो मन ही मन यह मना रहा था कि इस बार तो वह किसी और की झोपडी पर पंहुचा होगा। मगर उसके सारी धारणाएं एक ही पल में चकनाचूर हो गयी। इस बार तो रामू बहार आँगन में ही खड़ा था और उसे लगातार घुर रहा था।

“मत भाग, वो तुझे जाने नहीं देगी।” उसने कहा “चल हम दोनों उसको ख़त्म कर देते है।” ये कहते हुए रामू उसकी ओर बढ़ा।

“देख रामू, तूने अगर एक कदम भी इस ओर बढाया तो अच्छा  नहीं होगा।” उसने रक्षात्मक रुख अपनाते हुए कहा “इससे मेरा कुछ लेना देना नहीं, और उप्पर से मैं इन सब चीज़ों में नहीं मानता।” शंकर ने अपनी दलील दी।

“तुझे क्या लगता है कि लक्ष्मी मर गयी है, और उसकी आत्मा मुझे परेशान कर रही है?” रामू ने अपने सड़े दांत दिखाते हुए पूछा “वो नहीं मरी है, और न ही उसकी कोई आत्मा है। वो तेरी मेरी तरह नहीं है रे।” अब बात शंकर के समझ से परे जाती जा रही थी।

“ये बात तो मुझे शादी की पहली रात ही पता चल चुकी थी। मगर किसी ने मेरा विश्वास ही नहीं किया।” वो बोलता जा रहा था और शंकर बुत सा खड़ा सुनता जा रहा था। कुछ जाने की जिज्ञासा मनुष्य में एक ऐसा जूनून उत्पन्न कर देती है कि हर डर, हर खतरा उसके आगे छोटा लगने लगता है।

“हर रात वो मुझे खेत पर ले आती, फिर न जाने क्या क्या करने लगती। उसकी करतूतों से ही मेरी ज़मीन बंजर होती गयी।” रामू की आँखों में एक शोक सा भर आया था। “कितनी कोशिश करी मैंने उससे पीछा छुड़ाने की। तुझे भी बोल था मत आ, नहीं बचेगा।” ये कहते हुए उसके चेहरे के भाव अचानक वेहशी हो गए। वो शकर की और बढ़ा। शंकर ने उसे एक जोरदार धक्का दिया, जिसके चलते दोनों ज़मीन पर गिर गए। रामू का कन्धा पीछे पड़ी उसकी कुल्हाड़ी पर जा लगा। वो चीख उठा।

शंकर ने आव देखा न ताव। अपनी साइकिल उठा कर वो निकल पड़ा उस जगह से दूर। पीछे से अजीब सी हंसने की आवाज़े उसकी हृदयगति को बढ़ाये जा रही थी। वो आवाजें और तेज़ होती जा रही थी। पहले तो केवल रामू के चीखने की आवाज़ थी, पर धीरे-धीरे उसमे किसी और के रुदन और फिर लक्कड्बग्घो के रोने की और कई सारे उल्लुओं की  आवाज़ें मिलते गयी। शंकर पसीने में तरबतर निरावाकाश साइकिल चलता जा रहा था।

उस आवाजों को वो नज़रंदाज़ तो नहीं कर सकता था, पर उसे पता था कि अगर वो वहाँ से नहीं निकला तो उसके लिए अच्छा नहीं होगा। इस सब में एक बात तो उसके समझ बिलकुल नहीं आई, वो ये थी कि रामू ने उसे कब मन किया था कि इस ओर मत आ। और फिर उसको वो वाकया याद आया जो इन सब अनहोनी घटनाओ का अगुवा था। वो कनकटा कुत्ता। और कहीं न कहीं घूम फिर के उससे शंकर का सामना हो ही रहा था।

जो कुछ भी हो रहा था, वो सब उसकी समझ और उसके ज्ञान की व्याख्या से परे था। अब शंकर का शरीर जवाब दे रहा था, मगर उसका जज्बा उसे आगे बढ़ने को प्रेरित कर रहा था। रात का आखिरी पहर चल रहा था, दूर क्षितिज पर हलकी मधिम लालिमा दिखने लगी थी। उसके पेर पैडल पर ढीले हो चले थे। शरीर के कोने से शक्ति को खींच कर वो जैसे तैसे आगे बढ़ता जा रहा था।  उन आवाजों ने उसका पीछा नहीं छोड़ा था। जाने क्या चल रहा है, और इस सबका अंजाम जाने क्या होगा। लेकिन एक बात तय थी, हार मान लेना उसके लिए एक विकल्प नहीं था। अगर वो आज हार मान लेता है तो, माँ का क्या और उसके छोटे भाई-बहनों का क्या।

नहीं। मुझे घर पहुचना ही होगा। उसने खुद से कहा और फिर एक बार साइकिल पर अपनी पूरी ताकत झोंक दी। पता नहीं कब, यूँ ही संघर्ष करते-करते वो ज़मीन पर गिर पड़ा। माँ का परेशान चेहरा उसे उप्पर बादलो में दिखाई दे रहा था। वो चाह रहा था कि माँ से कहे कि घर पहुच रहा हु, पर उसके शरीर ने होंठ हिलाने की भी शक्ति नहीं थी। धीरे से उसके मस्तिष्क ने भी उसका साथ छोड़ दिया, और वो वही मूर्छित हो गया।

 

शंकर की आँख खुली तो उसने पाया कि सुबह हो चुकी थी। रोटी सिकने की खुशबु घर में फैली हुई थी। उसने एक गहरी सांस भरी। कुछ क्षण के खालीपन के बाद अचानक उसके दिल में उस रात का ख्याल आया। और वो  गया! क्या वो जिंदा था? उसे तो यकीन था कि वो नहीं बचेगा।

“उठ गया तू…” माँ ने उसके सिरहाने दूध का गिलास रखते हुए कहा। और फिर आँखें बंद कर कुछ बुदबुदाने लगी। “…ले दूध पी” कह कर वो चोके की ओर चली गयी। दूध का गिलास होंठों से लगते ही शंकर को एहसास हुआ कि वो कितना भूखा था। शंकर ने एक घूंट में सारा दूध पी लिया। माँ अन्दर से कुछ लाल मिर्चें मुट्ठी में बाँध कर ले आई और शंकर की नज़र उतरने लगी। शंकर को अभी भी यकीन नहीं हो रहा था कि वो जीवित था। लेकिन जो कुछ उसके सामने हो रहा था उससे तो यही अर्थ निकल रहा था कि  वो सही सलामत था।

“क्या कर रही है?” शंकर ने पूछा तो माँ ने इशारे से उसे चुप रहने का आदेश दिया। माँ ने कई बार मिर्चियों को उसके सर से पाँव तक घुमाया और फिर अन्दर चोके में चली गयी और उनको जला दिया।  मिर्ची जलने की तेज़ ढान्स से शंकर खांसने लगा।

“तू अब ऐसे किसी उटपटांग काम के लिए बखत-बेबखत इधर उधर नहीं जाएगा।” माँ ने गुस्से में उससे कहा

“मेरी तो जान ही निकल गयी थी। न जाने सारी  रात तू कहाँ था। वो तो भला हो उस लड़की का जिसने तुझे गाँव के बहार बेहोश होते देख लिया।” यह सुनते ही शंकर का सर चकरा गया। किस लड़की ने उसे बेहोश होते देखा? उसने तो उस वक़्त आस-पास किसी को नहीं देखा था। वो हर पल आश्चर्यचकित, और ज्यादा आश्चर्यचकित होता जा रहा था।

“कौन?” अनायास ही उसके मुंह से निकल पड़ा

“अपने गाँव की नहीं है। पर बहुत भली है है। बहार झाड़ू लगा रही है।” माँ ने हल्की सी हंसी के साथ कहा

तभी एक सकुचाई सी आकृति कमरे में दाखिल हुई। सांझ के ढलते सूर्य की किरणे उसके ताम्ब्र वर्ण को और भी स्वर्णिम बना रही थी। दिन भर के काम से शायद उसके केश जो सुबह एक स्पष्ट छोटी में गुंथे हुए थे, अब स्वतंत्र हर ओर हवा में  डोल रहे थे। और उसकी आँखे झिलमिलाते दीपक सी, जैसे ही शंकर की दृष्टि से सम्मुख हुई तो छुईमुई सी सकुचा गयी।

शंकर अपने होश खो चूका था । वो भूल गया था कि एक रात पहले ही उसके साथ क्या हुआ था, वो भूल गया था कि कुछ पल पहले उसको अपने जीवित होने पर भी संदेह हो रहा था। उसे याद रहा तो बस उस युवती का शर्मीला चेहरा।

“लग गयी झाड़ू?” माँ ने उससे पूछा तो शंकर को एहसास हुआ कि कमरे में उसके और उस लड़की के अलावा कोई और भी था।

“बेटी, देख शंकर को होश आ गया। अगर तू नहीं होती तो न जाने ये नालायक खेतों में कब तक यु ही पड़ा रहता ।” माँ ने वक्र दृष्टि से शकर की और देखा। ” इसलिए ही बड़े-बूढ़े ग्रहण के वक़्त निकलने से मना करते है।” ये कहते हुए माँ फिर चोके  की और बढ़ चली। शंकर अभी भी एकटक उस लड़की को निहार रहा था। और वो वहाँ कड़ी शर्म में डूबी जा रही थी।

कमरे में एक बैचैन सी ख़ामोशी थी। “हमारी भैंस कैसी है माँ?” उसने बात पलटने के लिए माँ से पूछा

“बेटा उसने तो रात में ही दम तोड़ दिया।” माँ ने धीमी आवाज़ में कहा, शायद वो शंकर की चिंता को कम करना चाहती थी। लेकिन शंकर के दिमाग से सारी फ़िक्र, सारी चिंता काफूर हो चुकी थी। उसे प्रेम हो गया था।

वो लड़की शंकर के घर में ही रहने लगी। कुछ महीनो बाद शंकर ने उस लड़की से अपने प्यार का इज़हार कर दिया । और उसने भी शर्मा कर, लजा कर एक रुकी सी हामी भर दी। शंकर को तो लगा जैसे उसके जीवन को अपना मतलब मिल गया, शायद ही गाँव में शंकर से ज्यादा खुश व्यक्ति कोई होगा। माँ को तो वो पहले ही पसंद थी, पर शंकर के बाबूजी इस रिश्ते से नाखुश थे। लेकिन उनका मत शंकर के लिए कुछ ख़ास मायने नहीं रखता था।

कुछ ही दिनों में दोनों की शादी हो गयी। शादी के पहले ही महीने में शंकर की माँ चल बसी। बीमार तो वो कई दिनों से थी, और इसीलिए उसने जल्द से जल्द शंकर की शादी करा दी थी ताकि अपने रहते वो शंकर की शादी देख ले। शंकर शादी के बाद से गाँव के लोगो से कटा-कटा सा रहने लगा था, और माँ के बाद तो उसने किसी से भी मिलना बंद कर दिया था। दिन हो या रात, बस खेत पर ही काम करता रहता था। और वहाँ भी उसे लगातार निराशा हाथ लग रही थी। जिस साल पुरे गाँव की फसल अच्छी होती उस साल भी शंकर के खेत में बमुश्किल कुछ पैदा होता।

लोग कहने लगे कि शंकर पागल होता जा रहा था। नहना धोना उसके छोड़ दिया था, घर में रहना भी एक दी उसने छोड़ दिया। गाँव के चौक पर पड़ा रहता था। और एक दिन उसकी बीवी भी न जाने कहाँ चली गयी। लोगो ने आखिरी बार उसको शंकर के साथ एक रात को खेत में जाते हुए देखा। और फिर अफवाहे उड़ चली। शंकर ने भी रामू की ही तरह अपनी बीवी को मार डाला। या, उससे तंग आ कर उसकी बीवी भाग गयी। सच कोई नहीं जानता था। शंकर के भाई-बहिन भी नहीं। वो तो जैसे-तैसे इधर उधर काम करके अपना पेट पाल रहे थे।

रात होते ही शंकर खेत की ओर चल देता। वहाँ एक जामुन का पेड़ था, उसी के नीचे वो सोता था। उसके साथ एक कनकटा कुत्ता भी रहने लगा था। कुछ लोगो का कहना था कि हर रात शंकर उस पेड़ से न जाने किस भाषा में बात करता था।

फिर एक दिन किसी ने कहा कि शंकर के खेत में उसकी पत्नी की आत्मा भटकती है!

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About Rohan Kanungo

Suffering from a disorder that leads to a constant mental escape to other universes and create stories, images and what-not in my mind. I love making friends and catching up with them. Travelling is something which I like a lot but am not able to do much, so I do the next best thing - Reading. I love looking through the window in the nothingness. :) I love my parents, probably the coolest set of individual to get together on the face of the planet.

Posted on April 9, 2013, in कल्‍पित, Uncategorized and tagged , , , , , , , , . Bookmark the permalink. Leave a comment.

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