चंद्रग्रहण – 1

बात उन दिनों की है जब न TV था, न कंप्यूटर, न ही आज की तरह मोबाइल फ़ोन हुआ करते थे की कहीं भी हो एक नंबर घुमाया और मनचाहे व्यक्ति से बात हो गयी | बात है १९४० के दशक की, भारत आज़ाद हुआ ही था | पुरे देश में, खासकर के नौजवानों में एक नया उत्साह था, नयी उमंग थी | ऐसा ही एक उत्साही नौजवान था, शंकर | वैसे तो शंकर ने इंटर पास कर लिया था, जिसके आधार पर उसी कहीं भी अच्छी नौकरी मिल सकती थी| मगर उसने अपने गाँव में ही रहना बेहतर समझा| ३-३ छोटे भाई बहनों की परवरिश का बोझ उसके कन्धों पर ही था| वैसे तो उसके बाबूजी अभी तक चलते फिरते थे, लेकिन कमाने का हुनर उनमे न था| वो तो मलंग थे | गाँव के नजदीक ही एक खेडा था, उसी खेड़े की सीमा पे एक प्राचीन शिव मंदिर था | कहते है उस मंदिर को कोई १२०० साल पहले बनाया गया था, और जब से वो मंदिर बना है तब से शंकर के पुरखे उसके पुजारी हैं | शंकर के बाबूजी भी अपनी पुश्तैनी परंपरा को आगे बढ़ाते हुए मंदिर से लग गए | पहले तो सब ठीक था लेकिन शंकर के सबसे छोटे भाई गणेश के पैदा होने के बाद से पता नहीं क्या विरक्ति हुई कि शंकर के बाबूजी, मुरली ने घर-बार छोड़ दिया और मंदिर में ही ठिकाना जमा लिया | दिन भर वहीं, कभी गांजे तो कभी भांग के नशे में पड़े रहते  | जिस तरह भारत में साधुओं की कमी नहीं उस तरह ही उनके मानने वालो की भी कमी नहीं है | जिस खेड़े की सीमा पे वो मंदिर था वहाँ के लोग मुरली बाबा को बड़ा मानते थे | शंकर के गाँव में भी कई लोग उनके भक्त  हो गए थे | पर शंकर को यह बात बिलकुल नहीं जँचती थी | जब से मुरली घर छोड़ गया था पुरे परिवार का बोझ उसकी माँ शारदा के कंधो  पर ही था| शारदा की सास बहुत खडूस थी| खैर सास तो मिटटी की भी बुरी होती है मगर सास के साथ  ४-४ बच्चो का बोझ और उनकी पदाई-लिखाई, फिर भी शारदा ने कभी अपना मन छोटा नहीं किया | अपनी जमीन किराये पे दे दी क्यूंकि अकेले उससे खेती होने की नहीं थी| दुसरो  के खेत में मजदूरी करके शारदा ने जैसे तैसा शंकर को बड़ा किया |

शंकर ने अपने बाबूजी की तरह मंदिर का रास्ता नहीं किया | मंदिरों  से तो वो बचपन से ही बिदकता था| एक बार उसके बाबूजी ने उसे मंदिर के लिए फूल तोड़ने भेजा| फूल तोड़ने के लिए जब शंकर झाड़ियो  में घुसा तो वहाँ कोई जंगली कुत्ता सुस्ता रहा  था | जैसे ही शंकर का पैर उसकी दुम पे पड़ा उसने पलट के शंकर की जांघ में एक जोरदार बल्ला भरा| तब से शंकर मंदिर और मंदिर के कामो से दूर ही रहने लगा | बाद में बाबूजी के इस तरह परिवार को छोड़ देने से मंदिर से उसकी दूरी और बढ़ गयी | वैसे इश्वर से उसकी कोई दुश्मनी नहीं थी मगर वो खुद पर और खुद के कर्म पर ज्यादा विश्वास करता था |  धुन के पक्के इस लड़के ने अपनी तरुणावस्था में ही मन बना लिया था कि वो अपनी पुश्तैनी जमीन पर खेती करेगा | इंटर पास करने के बाद वो गाँव वापस आ गया और वहीं खेती करने लगा, शाम को वो गाँव के बनिए-महाजनों के बच्चो को पढ़ा दिया करता था |

शंकर जब घर से निकला तब उसे अंदाजा नहीं था कि आज वो क्लास नहीं ले सकेगा | “आज ग्रहण है, रात होने से पहले आ जाना ” शारदा ने कहा था उसे जब वो अपनी साइकिल लिए आँगन से बहार निकल रहा था | शारदा को मालूम था कि मना  करने से शंकर रुकने वाला नहीं | काम भी कुछ ऐसा ही था| ३ दिन पहले शंकर की सबसे दुधारो भैंस का पाड़ा  ठण्ड के मारे परलोग सिधार गया था| पाड़े की मौत का सदमा भैंस को ऐसा लगा कि उसके थन सुख गए | दुधारू पशु का अगर दूध नहीं निकालो, या दूध देते देते वो अचानक बंद कर दे तो जल्दी ही वो बीमार पड़ जाता है  यु तो जाने अनजाने सारे इलाज़ आजमा के देख चूका था अपनी भैंस पे लेकिन कुछ असर नहीं हुआ| अगर इसी तरह चलता रहा तो भैंस की जान को खतरा भी हो सकता था | अगर भैंस का सही इलाज़ नहीं हुआ तो जो महीने के महीने दूध बाँट के घर में पैसे आते है वो बंद हो जाएँगे, खेती से तो साल में सिर्फ दो ही बार कमाई होती है  | नयी  भैंस खरीदने  के लिए उसे अगली  फसल  के आने  तक  रुकना  पड़ता ,  इसी  चिंता के चलते शंकर ने आज तहसील में बने जानवरों के अस्पताल जाने का मन बना लिया था|

अस्पताल गाँव  से कुछ २०-२५  मील  दूर  तहसील में था, घर से निकलते समय शंकर ने सोचा था कि दिन ढलने  से पहले वो वापस  तो आ ही जाएगा  | साइकिल चलने में वो अव्वल  था | मगर  सरकारी  अस्पतालों  का हाल  आज जैसा है उसे देख के यह  अंदाजा तो लगाया ही जा  सकता है कि तब कैसा  होगा | वहाँ  पहुच  कर शंकर को पता  चला  कि डाक साब  तो अस्पताल का चक्कर महीने में एक-दो बार लगाते  हैं | उनके  पीछे  एक  कम्पाउण्डर  है जो वहाँ  का काम काज  देखता  है और  उस  दिन तो वो भी  अस्पताल नहीं आया था | मगर  शंकर दवा लिए बिना जाने वाला कहाँ  था | लोगो  से पूछ  के कम्पाउण्डर  को ढूँढा, फिर  उसकी बड़ी जी हजुरी करके उससे दवा ली | ये सब करते करते सूरज पश्चिम को प्रवास कर चूका था| अगर शंकर कि जगह और कोई होता तो एक बार सोचता भी, लेकिन उसको तो धुन चढ़ गयी सो चढ़ गयी | उसने सोच लिया था कि आज भैसी को दवा दे के रहेगा, उसे न रात कि फ़िक्र थी न अँधेरे की| फिर उन दिनों संचार के इतने साधन नहीं थे की शंकर रात को वहीँ रुक जाए और माँ को खबर कर दे, माँ तो चिंता करेगी ही|

 

शंकर के गाँव जाने का रास्ता बहुत टेढ़ा था,  सड़के तो उन दिनों सिर्फ शहरो में हुआ करती थी| और ऊपर से ग्रहण वाली रात |  कोई कमजोर जिगर का होता तो रुक ही जाता | मगर शंकर ने बिना सोचे अपने साइकिल उठाई और तेज़ तेज़ पैडल मरने लगा| जानवरों के अस्पताल से लग कर एक कच्ची-पक्की  सड़क जाती थी | जो आगे जा के एक पगडण्डी में बदल जाती थी | इसी पगडण्डी से होकर, खेत-बड़ियो को लांघते हुए शकर को अपने गाँव पहुचना था |

 

जब से शंकर अस्पताल से निकला था, एक कनकटा कुत्ता उसके साथ हो लिया था | शंकर ने दिन में भी इस कुत्ते को देखा था, वो दिन भर अस्पताल की पेडियो  पे सोया पड़ा था| पहले  तो शंकर को लगा कि शायद थोड़ी दूर तक आके के वापस लौट जाएगा, मगर कुकुर महोदय का  लौटने का जी ही नहीं कर रहा था | एक बार तो शंकर ने सोचा कि पलट कर इसको भगा देता हूँ, फिर उसे लगा कि मेरा कुछ बिगड़ तो नहीं रहा साथ चलता है तो चलने दो | जल्दी ही शंकर गाँव कि सीमा से बाहर आ गया, पगडण्डी छोड़ के उसको खेतो कि मेढ़ो पे से निकलना पद रहा था|  कभी साइकिल पे तो कभी साइकिल हाथ में लेके, नाले-बावड़ी पार करते  करते वो बस्ती से बहुत दूर आ पंहुचा था |  अभी तो पूर्णिमा का चाँद पुरजोर रौशनी फैला रहा था मगर बीच बीच में बादलो के टुकड़े उसे ढँक कर राहगीर के लिए मुश्किलें बढ़ा रहे थे | पोश माह चल रहा था और बादलो को देख के कहा जा सकता था कि मावठा किसी भी पल आ सकता था | ठण्ड तो पहले ही बहुत थी और खेतो में गेहूं  की फसल के लिए छोड़े गए पानी से उसका पैनापन और बढ़ गया था|

अभी खेतो की कच्ची मेढ़ो के एकदम नए रस्ते पर शंकर ने चलना शुरू ही किया था की उसकी साइकिल के पहिये गीली नर्म जमीन में धंसने लगे | शंकर ने साइकिल से उतर कर साइकिल को कंधे पर चढ़ा लिया, और गीली जमीन पार  धीरे धीरे चलने लगा | जो कुत्ता इतनी देर से शंकर के पीछे पीछे चल रहा था वो अब उसके आगे आगे हो लिया |  चाँद और बादलों की लुका छुपी के चलते रस्ते का सही अंदाजा लगाना  मुश्किल हो रहा था,  कुत्ते के आगे चलने से शंकर को एक फायदा तो हो ही गया कि अब उसे ठीक ठीक मालूम था कि कहाँ पैर रखना सही है | कुत्ता थोड़ी देर चलता और फिर जब उसे एहसास होता कि शंकर पीछे रह गया है तो वो रुक कर शकर के आने का इंतज़ार करता |  ऐसा करते करते दोनों मुसाफिर खेतों की कतार के अंत में पहुच गए | वहाँ से आगे एक खोदरा था, जो खेतों को बीच से काटता हुआ निकल रहा था | खोदरा इतना चौड़ा था कि दो बैलगाड़ियां उसमे से आराम से निकल जाए और गहरा इतना कि ऊपर के खेतों में खड़े आदमी को २ फिट दूर से यह न दिखे कि अन्दर कौन है |   इसी खोदरे के रस्ते सुबह शंकर आया था | धीरे से उस खोदरे में उतर कर शंकर ने इधर उधर देखा तो पाया की कुत्ता जो अभी तक उसके साथ चल रहा था अब नदारत है | दूर दूर तक कोई नहीं था | यहाँ वहाँ रह रह कर जुगनू चमक रहे थे और झींगुर प्रेमालाप कर रहे थे | शंकर ने सोचा जानवर है उसका क्या है, एक मन थोड़े ही रहता है | खोदरे की जमीन में पत्थरों की अधिकता थी, यहाँ नरम मिटटी नहीं थी| शंकर साइकिल पर चढ़ गया | आस्मां में बादलों के ठ्ठ के ठ्ठ आ गए थे | बादलों के पीछे से चाँद की रौशनी कुछ धुंधली और बिखरी हुई सी आ रही थी | हवा में ठण्ड बढ़ गयी थी लेकिन खोदरे के आस पास की जमीन के नीचे होने से शंकर का हवा से तो बचाव हो रहा था |  खोदरे के दोनों और खेतो के किनारों पर बबूल और नीम के पेड़, ऊपर आसमान पर पर्दा डाले हुए थे और बड़े बड़े पेड़ो का संरक्षण पा के उनके नीचे जंगली झाड़ झंकड़ उग आये थे|

 

शंकर अपनी मस्ती में मगन और थोडा उनींदा सा साइकिल पर चला जा रहा था | तभी खेत के किनारों पर  उगी हुई  झाड़ियो में उसे सरसराहट सुने दी | पहले तो उसे लगा की कोई साँप-वाँप  है | उसने पैडल तेजी से चलाना शुरू कर दिए |  सरसराहट की आवाज़ भी तेजी से आगे बढ़ने लगी | शंकर ने साइकिल धीरे कर दी, और वो जो भी था आगे निकल गया, आगे जा के झाड़ियो में कुछ जगह थी वहाँ पर वो आवाज़ रुक गयी | अब तक शंकर भी पूरी तरह रुक गया था, वो साँस थामे उसी जगह को देख रहा था जहां वो अवाजुक गयी थी| फिर से कुछ सरसराहट हुई और एक थूथन वहाँ से बाहर आया| देखते ही शंकर पहचान गया की यह तो वही कनकटा कुत्ता था जो उसके पीछे पीछे आ रहा था| शंकर ने एक गहरी सांस ली| कुत्ता खोदरे के अंदर उतर गया और शंकर से कुछ दूर ठीक उसके सामने खड़ा हो गया| वो सीधे शंकर की आँखों में देख रहा था | एक क्षण  के लिए तो शंकर  के शरीर में सिरहन दौड़ गयी, उसे लगा मानो ये मूक जानवर अब कुछ बोल पड़ेगा | शंकर इसके आगे कुछ समझ पता उससे पहले कुत्ता उसके पीछे की ओर आके खड़ा हो गया | शंकर ने इस सबको  भूलना ही बेहतर समझा और फिर से साइकिल पर पैडल मरने लगा|

 

बादलों से छन के आ रही पूर्णिमा के चाँद की मद्धिम रौशनी अब शंकर की पीठ पे पड रही थी | उसके पीछे चलने वाले कुत्ते की एक धुंदली सी परछाई शंकर को जमीन पर दिख रही थी | अब उसके मन में जल्दी से जल्दी घर पहुचने की योजना चल रही थी | यह खोदरा आगे जा कर  एक मौसमी नदी में मिल जाता था | गाँवों में हर चीज़ के अनेक उपयोग होते है | जब बरसात होती है तो यही खोदरा खेतो से पानी निकल कर नदी में पहुँचाता  था , और जब बरसात का मौसम चला जाता है तो येही खोदरा बैलगाड़ियों की आवाजाही के काम आता था | इसी प्रकार वो नदी जिसमे आगे जा कर यह जुड़ता था, बाकी मौसमो में एक सड़क का काम भी करती थी | शंकर के पास आगे जा कर दो रस्ते थे, या तो वो नदी पर कर के दूसरी तरफ की पगडण्डी से अपने गाँव जा सकता था, या फिर नदी के रस्ते सीधे अपने घर के पीछे निकल सकता था |  नदी का रास्ता छोटा था और वो सीधे उसे उसके घर तक ले जा सकता था,  मगर सूखी नदी के तल में साइकिल चलाना आसन काम नहीं है | पगडण्डी से जाने पर आसानी से साइकिल चलाई जा सकती थी| मगर लम्बा रास्ता होने के साथ साथ  पगडण्डी के रस्ते जाने में एक और परेशानी थी| वो परेशानी थी, रामकृष्ण का खेत| अपने गाँव में घुसने से पहले शंकर को रामकृष्ण के खेत से होकर गुज़ारना पड़ता | गांवे में मशहूर था कि रामकृष्ण ने अपनी जवानी में अपनी बीवी को इसी खेत पर ला कर मारा था | क्यों मारा, इसके बारे में कई बातें मशहूर थी, जितने मुंह  उतनी बातें| और इस सब के साथ यह भी मशहूर था कि उसी खेत में रात को रामू की बीवी की आत्मा भटकती है| रामू अब पागल हो चूका था, लोगो का कहना था यह भी उसकी बीवी की आत्मा का कमाल था|  जो भी हो अब रामू का खेत बंजर था और गाँव के बड़े से बड़े बाहुबली की हिम्मत नहीं थी कि वो रामू के खेत पर कब्ज़ा कर ले| शंकर के सामने दुविधा थी कि वो जाए तो किस रस्ते से जाए|

 

यही सोचते सोचते शंकर खोदरे के मुहाने तक आ गया, अंततः उसने पगडण्डी के रस्ते जाने का मन बना ही लिया | उसे किसी भूत वूत का डर नहीं था, बस वो नदी के  पथरीली तल पर साइकिल नहीं चलाना चाहता था | शंकर नदी पार करने लगा, कनकटा कुत्ता अभी भी उसके पीछे पीछे चल रहा था |  उसकी धुंधली परछाई अभी भी शंकर को जमीन पर दिख रही थी| नदी के तल में माहौल आस पास से शांत था | यहाँ झींगुरो की आवाज़ और  जुगनुओ की रौशनी नहीं थी|

 

शंकर अब यह सोच रहा था की जल्दी से जल्दी घर पहुँच जाए, माँ उसकी राह देख रही होगी| नदी के पथरीले तल पर साइकिल चलाना आसान नहीं था| फिर भी शंकर पुरे जोर से पैडल चला रहा था| अचानक वो कनकटा कुत्ता दौड़ते हुए उससे आगे निकल गया| आगे जा कर नदी में एक मोड़ था, वो कुत्ते उस मोड़ के बाद शंकर की दृष्टीसे ओझल हो गया| यह दूसरी बार था जब इस तरह कुत्ता, उसके अलग भाग निकला था| शंकर ने ज्यादा ध्यान न देते हुए अपने रस्ते चलते रहना ठीक समझा| जैसे ही शंकर ने नदी के साथ-साथ मोड़ लिया, उसे कुत्ता आगे खड़ा हुआ दिखा| कुत्ता ठीक उसी अंदाज़ में खड़ा था जैसा वो पिछली बार खड़ा था, उसकी आँखें शंकर को एकटक देख रही थी| शंकर को फिर लगा कि वो कुछ बोलेगा| शंकर अपनी गति से उसकी ओर बढ़ा| जैसे ही शंकर उसके पास पंहुचा, कुछ ऐसा हुआ जो देख कर शंकर के पैर जम गए| एक क्षण के लिए उसकी सांस रुक गयी ओर उसका मुंह फटा का फटा रह गया| उसने साफ़-साफ़ देखा कि उस कुत्ते ने शंकर से कुछ कहा| ठिठक कर रुके शंकर के मुंह से अनायास ही “क्या?” निकल पड़ा|
कुत्ते ने उस प्रश्न का उत्तर भी दिया| “इस रस्ते से मत जा| नहीं बचेगा” वो बोला|

शंकर को काटो तो खून नहीं, शरीर पर जैसे उसका अधिकार छीन लिया गया हो| आंखे फाड़े वो कुत्ते को देखता ही रहा, फिर उसके पैर कांपने लगे ओर साइकिल से वो गिर पड़ा| जब तक वो कुत्ता वहाँ से भाग चूका था| शंकर वहाँ पड़ा हुआ था, वो होश में तो था पर उसका दिमाग अचेत हो चूका था| कुछ लम्बी सांसे लेने के बाद जब उसके होश ठिकाने आये तो उसने पुनर्विचार किया| उसे अभी भी विश्वास नहीं हो रहा था कि कुछ ऐसा हो सकता है| उसने पढ़ा था कि कई बार अधिक थक जाने पर इस तरह के छलावे होते हैं| जैसे-जैसे समय बीतता जा रहा था, उसका इस वाकये पर यकीन कम होते जा रहा था| जल्द ही उसने इसे भूल कर आगे बढ़ने का मन बना लिया था, वो था तो बड़ा हिम्मती| मगर जो कुछ हुआ उसने थोड़ी देर के लिए उसकी हिम्मत को डिगा दिया था, उसके दिल में कहीं न कहीं एक भय घर कर गया था|

 

अभी भी नदी के तल में साइकिल चलते हुए वो यही सोच रहा था कि वो कुत्ता आखिर उसके साथ क्यों आया, ओर आखिर उसने उसे ऐसे बोला क्यों| अँधेरा और बढ़ गया था| कुछ देर पहले तक जो चाँद अपनी दुधिया रौशनी से नहला कर बादलो को कपास के फोए की तरह बना रहा था, अब उसकी रौशनी मद्धम पड़ने लगी थी| ग्रहण शुरू हो रहा था| रातों का अपना अलग जीवन होता है| झींगुर, जुगनू, गिरगिट, गीदड़, लोमड, चूहे जैसे कई जीव जो दिन में अपने-अपने ठिकानो में चुप जाते है, वो रात में खाने की तलाश में निकल आते है| इन सब में सबसे अजीब और घिनोना प्राणी होता है लकडबग्घा| मुख्यतः मरे हुए जानवरों के शवो से अपना भोजन जुटाने वाला यह जीव एक बेहद ही ख़तरनाक आवाज़ करता है| जो कई मील दूर तक सुनाई पड़ती है| कमज़ोर दिल वाले तो बस उससे ही डर जाते है| और अगर यह किसी के सामने आ गया तो, इसका अजीब रूप देख कर तो होश उड़ जाना पक्का है| आगे पैर पिछले पैरो कुछ बड़े होते है और गर्दन से लेकर पीठ पर घोड़े की तरह बाल|

रह-रह कर शंकर को लक्कड़बग्घों के रोने की भयावह आवाज़ शंकर के कानो में पद रही थी| जैसे जैसे वो आगे बढ़ रहा था, यह आवाज़ तेज़ और तेज़ होती जा रही थी| उसने अपने आप को लक्कड़बग्घों से सामने के लिए मानसिक रूप से तैयार कर रखा था| चाँद कि घटती रौशनी के साथ ही, रात कि आवाज़ें और तेज़ हो गयी थी| दूर कहीं, शंकर को कुछ आकृतियाँ चलती हुई दिखी, जिस तरह से वो चल रही थी, लग रहा था कोई जानवर ही है| चमगादड़ो का एक छोटा सा झुण्ड शकर के उप्पर से उड़ कर गया, एक चमगादड़ तो शंकर से बस बाल भर की दुरी से निकला| पास पहुचते हुए शंकर को यह साफ़ हो गया कि वो आकृतियाँ लक्कड़बग्घों की थी|
कहीं से उन्हें मारा हुआ कोई जानवर मिल गया था, जिसको वो चीथड़े-चीथड़े कर खा रहे थे| शंकर की साइकिल की आवाज़े सुनते ही वो सतर्क हो गए| वो रुक कर शंकर की ओर देखने लगे| शंकर ने तो पहले से ही इस सामने के लिए खुद को तैयार कर रखा था| वो बिना रुके उनकी ओर बढ़ रहा था| कुछ देर शंकर को देख कर लक्कड़बग्घों को समझ आ गया था कि शंकर रुकने वाला नहीं था| यह समझते ही उन्होंने वहाँ से भागने में ही भलाई समझी| अजीब से, किसी पागल के हंसने के सामान आवाज़ करते हुए, वो वहाँ से भाग निकले|

शंकर उन पर ध्यान न देते हुए आगे बढ़ना चाह रहा था, मगर  के कोने से उसको कुछ ऐसा दिखा कि वह ठिठक गया। जिस जानवर को वो लक्कड्बग्घे नोच नोच कर खा रहे थे वो वही कनकटा कुत्ता था। पहले तो शंकर को विश्वास नहीं हुआ, क्यूकि कुत्ता तो  उलटी दिशा में गया था। और तो और उसने लक्कड्बग्घो और कुत्ते के बीच किसी संघर्ष की आवाज़ भी नहीं सुनी। लेकिन उस क्षत-विक्षत शव का सर, जो एक बाबुल के पेड़ के नीचे पड़ा था, उस सर का भी कान ठीक उसी तरह कटा हुआ था जैसा की उस कुत्ते का था । शंकर की साँसों की गति तेज़ हो गयी थी। उसका ह्रदय जो बड़ी बड़ी मुश्किलों को झेल गया था, अब थोडा डिगने लगा था। वो मूर्ति के सामान खड़ा हो कर उस शव को देख रहा था, कि अचानक कही दूर कोई उल्लू बोलने लगा। उल्लू की इस ध्वनि ने शंकर की धुन को तोड़ दिया। शंकर ने पाया कि उसका कुरता पसीने में पूरी तरह भीग गया था। हवा तो अब पहले से भी ठंडी चल रही थी, लेकिन शंकर के सर से तो किसी बरसाती झरने की तरह पसीना चू रहा था। ग्रहण अब अपने चरम पर था, सोमदेव रहू के पाश में करीब करीब कैद हो ही चुके थे।

ग्रहण का सम्बन्ध भारतीय मान्यताओं में कभी भी सुखद कहानियो से नहीं रहा है। आज भी कई घरो में ग्रहण छुट जाने के बाद शुध्दिकरण की क्रियाएँ संपन्न की जाती है। मगर शंकर नए विचारो वाले भारत का नागरिक था, ऐसी पुरातनपंथी मान्यताएँ उसको मंज़ूर नहीं थी। यह रात उसके इन विचारों की परीक्षा की रात थी। पार्श्व से निरंतर एक ताल में आती उल्लू की आवाज़ अब अँधेरी हो चली रात को एक स्थायित्व प्रदान कर रही थी। आसमान में बादलों  के पीछे के उस सफ़ेद गोले को पृथ्वी की परछाई ने पूरी तरह ढँक लिया था। रात का तीसरा  पहर शुरू हो रहा था। भूत प्रेत के किस्से सुनाने वाले लोगो को इसी पहर में सबसे ज्यादा पारलोकिक अनुभव होते है, क्यूंकि इस पहर में  ही रात सबसे गहरी होती है।

 शंकर के पेर साइकिल पर लगातार एक मशीन की भाँति चल रहे थे। उसने अपने अन्दर की सारी उर्जा, साड़ी शक्ति और साड़ी हिम्मत को इकठ्ठा कर अब बिना किसी पथांतर एक लक्ष्य की और बढ़ने की ठान ली थी। अँधेरी रात में खुद ही के भरोसे यह नौजवान आगे और आगे बढ़ता ही जा रहा था। उसका शरीर पैडल चलने की एक लय में आ चूका था। साइकिल के चैन कवर से रगते हुए पेडल आवाज़ एक नियमित ताल में आ रही थी। पहले से आ रही उल्लू की आवाज़ अब दूर और दूर होती जा रही थी। शंकर को महसूस होने लगा कि अब शायद कुछ विचित्र, कुछ अजीब नहीं होगा। लेकिन शायद भाग्य को ऐसा मंज़ूर नहीं था, अगला पैडल मरते ही शंकर की साइकिल की चैन उतर गयी और उसने अपना संतुलन खो दिया। वो पगडण्डी के किनारे वाले खेत में जा गिरा। और उसके दुर्भाग्य को शायद सिर्फ इतने से संतोष नहीं हुआ, कि आसमान में एकत्रित मेघों ने वर्षा का सूत्रपात कर दिया।

एक पल को तो शंकर झुंझला ही गया, उसे लगा कि वो क्या कर जाए। शायद इससे बुरी रात उसके जीवन में पहले कभी नहीं आई थी। धरा पर बरसती पानी की बूंदों के शोर ने आस पास की सारी आवाजों पर एक पर्दा सा दाल दिया। शंकर कीचड से भरी उस ज़मीन पर खड़ा अपने खोये दिशा ज्ञान को पुनः स्थापित करने की कोशिश करने लगा। उसे तो यह भी पता नहीं था कि उसकी साइकिल कहाँ पर गिरी थी। बारिश के साथ तेज़ हवा भी चलने लगी, अब शंकर के सामने समस्या यह थी कि ऐसी बारिश में वही रुक रहे या आगे बढ़ने का जोखिम उठाये। रुके रहना तो उसे वैसे भी मंज़ूर नहीं था, तो उसने अंदाज़े से साइकिल दूंदने की कोशिश शुरू कर दी। काफी देर कीचढ़ में टटोलने के बाद साइकिल का पहिया उसके हाथ में आया। उसने अँधेरे में ही साइकिल की चैन वापस चढ़ाई और उसपर सवार हो गया। पगडण्डी पर कीचड तो काफी हो गया था, अब शंकर को पहले से कंही अधिक जोर लगाना पड़ रहा था। उसकी गति मंथर हो चली थी। शंकर अब अपने हर उस फैसले को कोस रहा था जिसके चलते वो इस वक़्त इस हाल में था। तभी उसको वो वाकया याद आया, जब उस कनकटे कुत्ते ने उसे इस रास्ते जाने से मन किया था। उस बात को तो शंकर एक भ्रम मान कर भुला चूका था, लेकिन शायद उसी भ्रम ने शंकर को एक चेतावनी जरूर दी थी।

बारिश अब थोड़ी थम सी गयी थी। और शंकर की ख़ुशी का तब ठिकाना नहीं रहा, जब उसने दूर एक लालटेन जलती हुई देखी। उसी पल शकर ने निर्णय कर लिया कि जैसे भी हो हाथ पैर जोड़ कर आज रात वो यही आसरा ले लेगा। उसने साइकिल रौशनी की दिशा में मोड़ दी।

“भाई कोई है?” शंकर ने पूछा

जहाँ  लालटेन तंगी थी वही एक पुरानी झोपडी थी, जो एक खाली खेत के बीचोबीच बनी हुई थी। अन्दर से हल्का-हल्का धुँआ भी उठ रहा था। कुछ देर रुकने पर भी जब किसी का जवाब नहीं आया तो शंकर दुबारा आवाज़ लगाई। लेकिन परिणाम वही रहा। शंकर ने दरवाज़े को जब हलके से धक्का दिया तो दरवाज़ा खुल गया। अन्दर कोई नहीं था, बस एक छोटा सा दीपक चूल्हे के पास जल रहा था। चूहे पर एक बर्तन रखा था और नीचे एक थाली में दो रोटी। भूख तो शंकर को बड़े जोरो की लगी थी। और सामने थाल सजा था, मगर उसका शिष्टाचार उसे इस बात की इजाज़त नहीं दे रहा था कि वो किसी के घर में घुस कर बिना पूछे कुछ खा ले।

शंकर चूल्हे के नज़दीक झोपडी के उस गर्म कोने में बैठ गया। दिन भर की भागदौड़ और रात की घटनाओ से उसका शरीर और मन दोनों थक चुके थे। उसने अपने कुर्ते की जेब में हाथ डाल कर भैंस की दावा की शीशी का होना सुनिश्चित किया। यही वो चीज़ थी जिसके लिए उसने सारी  मुसिबत  मोल ली थी। उसने खुद को दिलासा दिया कि अगर वो सुबह सूर्योदय के साथ ही निकल पड़ता है तो सुबह के चारे के साथ वो भैंस को दावा खिला सकता है। इसी  उधेड़बुन में उसे नींद कब लग गयी उसे पता भी नहीं चला।  शायद शंकर के लिए इस रात का सबसे सुहाना पल वही था।

…शेष अगले भाग में/To be continued

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About Rohan Kanungo

Suffering from a disorder that leads to a constant mental escape to other universes and create stories, images and what-not in my mind. I love making friends and catching up with them. Travelling is something which I like a lot but am not able to do much, so I do the next best thing - Reading. I love looking through the window in the nothingness. :) I love my parents, probably the coolest set of individual to get together on the face of the planet.

Posted on April 2, 2013, in कल्‍पित and tagged , , , , , , , , , , . Bookmark the permalink. Leave a comment.

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