बेतरतीब ख्याल 1

16 06 2009

This is a collection of urdu poetry that sprang out of my mind at different times. I have collected them all and here i publish them

Ishq

इश्क़ वो भी फ़रमाते हैं पर यह वो हमसे कभी फ़रमाते नहीं,
कहलाये हम आशिक़ तो हैं पर माशूक़ वो कहलाते नहीं|

Kaun

अर्श में वो हैं ज़मी में वो हैं,
आफ़ताब में वो हैं, चांदनी में वो है,
ख़ुशी में वो हैं, गमी में वो हैं,
 ज़्यादती में वो हैं, कमी में वो हैं,
तपिश में वो हैं, नमी में वो हैं,
अब तो हम ही में वो है, अब तो हम ही में वो है|

Vaham

रहने दे थोड़ा वहम इस खुशफहमी  का ही है नतीजा, 
कि हम तेरे दर से आज भी गुज़रते हैं|

Mohur

वफ़ा से ऐतबार तो कबका उठ चूका था ऐ खुदा,
तुने तो बस उस पर अपनी मोहर लगा दी|

Zindagi

मुफलिसी में कट रही है जैसी भी है ज़िन्दगी
हमको तो ऐसी पसंद है जैसी भी हो ज़िन्दगी|

 




सरफ़रोशी की तमन्ना अब ना किसी के दिल में है

16 06 2009

Here i publish my own version of Sarfaroshi ki tamanna. This may seem a poem out of the movie ‘Gulaal’ but it is actually just an inspiration or what ever you may say. Decide for yourself. Although incomplete i couldnt wait to publish it

सरफ़रोशी की तमन्ना  अब ना किसी के दिल में है,
दिल ढूँढता किसी फिक्रमंद को मज़मा-ऐ-कातिल में है|    
 
न रगों में है रवानी न लहू में इंक़लाब,
मर गए जो थे भगत सिंह मर गए जो थे सुभाष|
आज का नौजवाँ अश्फाक न बिस्मिल में है|
सरफ़रोशी की तमन्ना  अब ना किसी के दिल में है|
 
छेद ही अब दिख रहे, पानी अब न रुक रहा,
हमको बस दौलत से मतलब डुबे कश्ती या जहां|
मौत अब तो  आनी आरजू-ऐ-साहिल में है| 
सरफ़रोशी की तमन्ना  अब ना किसी के दिल में है|

 

कौम का कोई नहीं हर शक्स अब है अलहदा 
आलम-ऐ-खुदगर्जी देखे तो डर जाए वो ख़ुदा|

आबरू मुल्क की तवायफ़ गिदडो की महफ़िल में है|
सरफ़रोशी की तमन्ना  अब ना किसी के दिल में है|

 








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