Here i publish my own version of Sarfaroshi ki tamanna. This may seem a poem out of the movie ‘Gulaal’ but it is actually just an inspiration or what ever you may say. Decide for yourself. Although incomplete i couldnt wait to publish it
सरफ़रोशी की तमन्ना अब ना किसी के दिल में है,
दिल ढूँढता किसी फिक्रमंद को मज़मा-ऐ-कातिल में है|
न रगों में है रवानी न लहू में इंक़लाब,
मर गए जो थे भगत सिंह मर गए जो थे सुभाष|
मर गए जो थे भगत सिंह मर गए जो थे सुभाष|
आज का नौजवाँ अश्फाक न बिस्मिल में है|
सरफ़रोशी की तमन्ना अब ना किसी के दिल में है|
सरफ़रोशी की तमन्ना अब ना किसी के दिल में है|
छेद ही अब दिख रहे, पानी अब न रुक रहा,
हमको बस दौलत से मतलब डुबे कश्ती या जहां|
मौत अब तो आनी आरजू-ऐ-साहिल में है|
हमको बस दौलत से मतलब डुबे कश्ती या जहां|
मौत अब तो आनी आरजू-ऐ-साहिल में है|
सरफ़रोशी की तमन्ना अब ना किसी के दिल में है|
कौम का कोई नहीं हर शक्स अब है अलहदा
आलम-ऐ-खुदगर्जी देखे तो डर जाए वो ख़ुदा|
आबरू मुल्क की तवायफ़ गिदडो की महफ़िल में है|
सरफ़रोशी की तमन्ना अब ना किसी के दिल में है|
Recent Comments