सरफ़रोशी की तमन्ना अब ना किसी के दिल में है

16 06 2009

Here i publish my own version of Sarfaroshi ki tamanna. This may seem a poem out of the movie ‘Gulaal’ but it is actually just an inspiration or what ever you may say. Decide for yourself. Although incomplete i couldnt wait to publish it

सरफ़रोशी की तमन्ना  अब ना किसी के दिल में है,
दिल ढूँढता किसी फिक्रमंद को मज़मा-ऐ-कातिल में है|    
 
न रगों में है रवानी न लहू में इंक़लाब,
मर गए जो थे भगत सिंह मर गए जो थे सुभाष|
आज का नौजवाँ अश्फाक न बिस्मिल में है|
सरफ़रोशी की तमन्ना  अब ना किसी के दिल में है|
 
छेद ही अब दिख रहे, पानी अब न रुक रहा,
हमको बस दौलत से मतलब डुबे कश्ती या जहां|
मौत अब तो  आनी आरजू-ऐ-साहिल में है| 
सरफ़रोशी की तमन्ना  अब ना किसी के दिल में है|

 

कौम का कोई नहीं हर शक्स अब है अलहदा 
आलम-ऐ-खुदगर्जी देखे तो डर जाए वो ख़ुदा|

आबरू मुल्क की तवायफ़ गिदडो की महफ़िल में है|
सरफ़रोशी की तमन्ना  अब ना किसी के दिल में है|

 








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