बेतरतीब ख्याल – 2

7 02 2012
शफ़क़

यह भी एक तजुर्बा हुआ,
साथ तेरे जो यह किस्सा हुआ
जाने क्या था तेरे दिल में
जाने क्यों तू मेरी नफ्स का हिस्सा हुआ|

सोचा था तू भी जल रहा है
साथ मेरे फ़ना होने को तू भी चल रहा है
कल रात जो ये बात साफ़ हुई
उस खुशफहमी का न होना खल रहा है|

अब तो उम्र बची कटेगी तेरे शफ़क़ में
हमारी तो ज़िन्दगी भी रहती है मौत की फ़िराक में
जो चाँद अह्द-ए-नूर गुज़रे थे तेरी राह में
वो हसीं लम्हे ही मिला गए हमे खाक़ में

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चलते-फिरते 

1.सूखे  पत्तो की तरह दिल की शाख़ से उम्मीदें झड जातीं है, वक़्त की हर आँधी के साथ,

     सुबहों की आस में ये रात कट रही है, जानते हुए कि रात ही है इस रात के बाद|

2. इश्क मुझे तेरे दिलफ़रेब क़ल्ब से है,

वर्ना सहेली तेरी भी हसीं कम नहीं|

3. तेरे ख़यालात ने नींद की जगह ली है, तेरे सिवा मुझे कुछ भाता क्यों नहीं?

जनता हूँ तू न होगा आगे, पर तुझ बिन जीना मुझे आता क्यों नहीं|

4. ख़ुदकुशी का कोई इरादा तो न था, काश मैं तुझसे मिला न होता,

     हाँ कुछ देर की खुमारी थी ज़रूर, पर ताउम्र का ये गिला न होता|








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