वीर

22 05 2009

कौन है जो आगे आये?
कौन अपना सर कटाए?
ऐसा कोई वीर है यहाँ कहाँ?

वीर की वसुंधरा,
तू क्यों खडा डरा-डरा?
आगे बढ़ तू आज अपनी जीत कर|

पुकार है यह युद्घ की,
धरा तेरी अशुद्ध की,
ऐसे दुश्मनों का आज अंत कर|

अश्व अस्त्र गज से युक्त,
 तू सारे बन्धनों से मुक्त,,
 साथ तेरे सर्वशक्तिमान है| 

म्रत्यु जब न अंत है,
किसका फिर आतंक है?
सर्वस्व आपना आज दे लड़ा|

खड़ी जो उसकी फौज हो,
प्रचंड तेरी ओज हो,
सनसनी लहू में उसके भर तू दे|

खडग  कटार बाँण से,
तू जैसे भी हो प्राण ले,
वीर तू तभी तो कहलायेगा|

शीश उसका काट तू,
तन को उसके बाँट तू,
युद्घभूमि में रक्त रस बहे|

अंग अंग भंग हो,
न साथी कोई संग हो,
अपने दुश्मनों का ऐसा नाश कर|

जो तर  गया सो जीत है’
जो मर गया तो रीत है,
वीर को सदा जग है पूजता|

 








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