‘मुझमे ही वो खुशबू थी जिससे तुने मिलवाया था|’
कभी आपके साथ जीवन में ऐसा हुआ है कि आपने किसी चीज़ को पाने के लिए जी तोड़ कोशिश की हो और आपको वो न मिली हो (यहाँ मैं सिर्फ आपके प्रेमी/प्रेमिका को पा लेने की बात नहीं कर रहा हूँ)? अगर हाँ तो ज़रा याद कीजिये कैसा लगा था उस वक़्त| ऐसा लगता है मनो उससे ज्यादा महत्वपूर्ण जीवन में कुछ भी नहीं| उस वक़्त हमे कई लोगो से यह सुनने को मिलता है कि तो क्या हुआ कि तुम्हे यह नहीं मिला, ज़िन्दगी आगे बढ़ने का नाम है| हम यह जानते है, मगर क्यों हमारा दिल यह मानने को तैयार नहीं होता?
कहा जाता है कि हम अपने जीवनके कुछ खूबसूरत पल सिर्फ इस लिए गवाँ देते है क्यूंकि उस वक़्त हम जो ना मिल सका उसके लिए तड़प रहे होते हैं| परेशान होते हैं, खुद से ही एक विद्रोह कर रहे होते हैं| असली ख़ुशी किसी चीज़ को पा लेने में नहीं, असली ख़ुशी मनुष्य के अन्दर ही कहीं छुपी होती है| और यह ख़ुशी असीमित है, अनंत है, अपार है| हम यह समझते है पर क्यों इसे अपने जीवन में नहीं उतार पाते है? क्यों जी करता है कि किसी भी तरह, किसी भी तरह हम वो पा ले जो न मिल सका?
हम जिन चीज़ों कि पीछे भागते हैं वो कहीं न कहीं हमारे मस्तिष्क में छिपी यादों का अविर्भाव होता है| और इन चीज़ों का पा लेना हमारे अंदर छिपी ख़ुशी के उत्सर्जन का एक बहाना होता है| फिर भी क्यों मन में कहीं एक टीस रह जाती है, जो रह रह के किसी चीज़ के ना होने का एहसास कराती रहती है? हमारे अन्दर जो ख़ुशी छिपी है उसे बाहर लेन के लिए हमे संसारिकता का दास क्यों बनना पड़ता है? क्या उस ख़ुशी को बाहर लाना इतना कठिन है कि हम खुद चाह के भी उसे बाहर नहीं ला सकते?
हमारे अन्दर हमेशा इस सच को अपनाने के प्रति हमेशा एक विद्रोह होता है| एक ऐसा विद्रोह जो हमेशा इस बात पे अटल रहता है कि अगर तुम्हे ख़ुशी मिल सकती है तो फलां वास्तु कि प्रप्ति से बस| इसके अलावा तुम्हे कुछ खुश नहीं कर सकता| जरूरी नहीं कि यह वास्तु कोई मूल्यवान वास्तु हो| यह कुछ भी हो सकती है| और कभी कभी तो यह वास्तु कोई वास्तु ना होकर सिर्फ कोई एक घटना या एक बात या कुछ भी हो सकती है| ऐसा क्यों होता है? और फिर अंत में ऐसा क्यों लगने लगता है कि ऐसा मेरे साथ ही क्यों होता है? और बाद में यह भावना इस में क्यों बदल जाती है है कि मेरे साथ तो ऐसा ही होता है?
क्या जीवन में खुश रहना इतना कठिन है? क्या मनुष्य कभी सच-मुच में खुश होता है? क्या खुश होना इतना कठिन है?
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