आज अरसे बाद फिर रोने को जी चाहता है,
खुद की खोज में खुद ही को खोने का जी चाहता है|
बस आगे दौड़ रहा हूँ, इस दौड़ में कितना खोया, और कितना पाया,
इसका क्या कभी कोई हिसाब कर पाया
मिलते-बिछड़ते हर किसी से एक अलग रिश्ता बनाया|
साथ मेरे अब भी उन सबों की खुशबू है,
बस अब फर्क नहीं कर सकता, कौन मैं और कौन तू है|
मुड़ कर देखा तो पाया कुछ कदमों पहले कितने बावले, कितने पागल थे हम,
आज फिर उसी तरह पागल होने को जी चाहता है,
आज अरसे बाद फिर रोने का जी चाहता है|
एक ही आगाज़, एक ही राह और अनजानी मंजिल को बाँटा था साथ जिनके,
अब अलग मंजिल, अलग इरादे, अलग रस्ते है उनके|
कभी-कभी किसी दोराहे, चौराहे पर सुस्ताते हुए मिल जाते है,
कुछ पल साथ बैठ, यादें गर्म कर अपनी-अपनी राह पर निकल जाते है|
उन सबके साथ एक बार फिर से हो लेने को जी चाहता है,
आज अरसे बाद फिर रोने को जी चाहता है|
कुछ अधुरा छुट गया है, लगता है यूँ ही हर बार,
मन का लालच है या दिल का प्यार|
क्या कभी यह लालच कम होगा,
यह जो मोह है क्या कभी ख़त्म होगा|
रह गए है जो अधूरे पल उनको फिर एक धागे में पिरोने को जी चाहता है,
आज अरसे बाद फिर रोने को जी चाहता है|
Waahhhhhhhhhhhhhhhhh………….
Sahi Likha hai mere dost……..Rohan Kavi…