आज बारिश हो रही है| मैं दफ्तर के अंदर बैठ के देख रहा हूँ, और सोच रहा हूँ की क्या मेरे शहर में भी बारिश हो रही होगी| खुद को काफी देर रोकने के बाद बरसात के रुकते ही आखिरकार मैं बाहर आ ही गया| बारिश के बाद मिट्टी से आने वाली खुशबु आज भी उतनी सुहानी लगती है जैसी की बचपन में लगती थी| बरसात के मौसम में शहर का रूप अलग ही हो जाया करता था| कीचड के कारण सड़क पर चलना दूभर हो जाया करता था| सड़क के दोनों ओर मिट्टी पर नयी घास उग आया करती थी| बारिश में हर चीज़ नयी होती थी नयी किताबें, नए कपडे, नए जूते और कभी कभी नए दोस्त भी| और उस नए नए संसार में मन उल्लास से भर जाता था|
मुझे आज भी याद है जुलाई की नम सुबह को जब माँ जल्दी उठा कर, तैयार कर, टिफिन दे के स्कूल भेजती थी तो लगती था की कब मैं बड़ा होऊँगा और कब स्कूल से पीछा छुटेगा| आज भी हवा में वही नमी, वही खुशबु को महसूस करता हूँ, मगर अब सुबह न माँ उठती है न टिफिन मिलता है| ऑटो वाले भैया के आने का समय होता था तो लगता था की भगवान आज बारिश इतनी तेज़ हो की ऑटो आ ही न पाए| और जब ऑटो आ जाता था तो मन यही कहता था की आज बरसात के कारण स्कूल की छुट्टी हो जाये| ऐसा नहीं था कि मुझे स्कूल जाना ज़रूरी था| मेरा चेहरा देख के माँ पूछ लिया करती थी कि आज जाना है या नहीं| मैं मना कर दूं तो माँ मान जाती थी मगर मना करना मन को अच्छा नहीं लगता था| और अब जब ऑफिस आने का समय नजदीक आता है तो जान सूख जाती है| बरसात के कारण दफ्तर की छुट्टी हो ऐसा तो असंभव ही है| जुलाई के महीने के दिनों में जब सुबह सुबह बादल नीले आसमान को घना काला और मटमैला बना देते थे तो क्लास में क्या चल रहा है यह तो ध्यान ही नहीं रहता था, बस मन खिड़की से बाहर आसमान की और भटकता रहता था|
हवा चलते ही आस पास लगे नीलगिरी बादल पेड़ झुमने लगे और कुछ देर के लिए मैं वापस वर्तमान में लौट आया| बचपन में भी स्कूल में लगे यही पेड़ हवा के साथ ऐसे ही झूम जाया करते थे, और मैं खिड़की के पास बैठा इनका अक्स अपने चश्मों में देखा करता था| खाने की छुट्टी में स्कूल के आते में पुरानी पड़ी लकडियों पर उग आये कुकुरमुत्तो को इकठ्ठा करा करते थे और उन्ही लकडियों पर रहने वाले घोंगो को पकड़ कर उनकी दौड़ कराया करते थे| आज तो उन्ही कुकुरमुत्तो की बनी सब्जी ऑफिस के कैंटीन में खाते हैं|
आसमान में एक बार बादल डेरा दाल दे तो समझो कई दिनों तक सूर्य देवता दर्शन नहीं देंगे| दिन भर बादल उमड़ घुमड़ कर गरजते रहते थे, मनो डरते हो की अब बरसे कि तब बरसे| ऐसे में स्कूल से वापस आ कर भी बाहर खेलने जाने कि इजाज़त तो मिलती ही नहीं थी| दादी हमेशा गर्म कपडे पहनने को बोलती रहती थी और मैं यहाँ वहाँ भागा करता था| शाम को अगर बारिश हो गयी तो पापा कि फरमाइश पर गर्मागर्म भजिये बन जाया करते थे| आगे वाले कमरे मैं खिड़की दिन पास बैठ कर गिरती बारिश को देखा करता था, धंटो तक| आँगन में पतरों पर से गिरने वाला पानी छोटे छोटे गड्ढ़े बना दिया करता था| उस गिरते पानी में अनगिनत कहानियाँ मन में बुन लेता था| आँगन में बहने वाला पानी नदी बन जाता था और पतंगे, चींटियाँ, मकोडे और कई कीडे उन कहानियों के किरदार|
बारिश के रुकते ही आँगन और पीछे के बाड़े में दीवारों पर उग आये तरह तरह के पौधों को देखने निकल जाया करता था| उन पौधों में एक फली वाला पौधा हुआ करता था जिसकी फली पानी लगते ही ‘पट्ट’ कि आवाज़ से फुट जाती थी| उसे फोड़ने में जो मज़ा आता था वो आज ना किसी डिस्को में आता है, न किसी पब में| अगर बारिश अँधेरा होने तक नहीं थमती और मन फिर यही प्रार्थना करने लगता था कि भगवान् करे कि बारिश रात भर न थमे और सुबह स्कूल न जाना पड़े, यही सोचते सोचते नींद लग जाती थी| अगले दिन उठ कर फिर स्कूल और वही क्लास|
लेकिन आज बारिश का होना न होना एक जैसा ही| एयर कन्डिंशन्ड ऑफिस में बैठ कर कंप्यूटर पर उंगलियाँ चलाने का बसात से क्या सम्बन्ध| हल्की हल्की बूंदा-बंदी फिर से शुरू हो गयी है| और अन्दर दफ्तर में मेरा काम इंतजार कर रहा है| यहाँ तो कोई नहीं पूछेगा कि आज काम करना है या नहीं| अन्दर आते आते मैं सोचने लगा कि क्या मेरे शहर में आज भी वैसी ही बारिश होती होगी? शायद……..|
बारिश
22 05 2009Comments : 2 Comments »
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वीर
22 05 2009कौन है जो आगे आये?
कौन अपना सर कटाए?
ऐसा कोई वीर है यहाँ कहाँ?
वीर की वसुंधरा,
तू क्यों खडा डरा-डरा?
आगे बढ़ तू आज अपनी जीत कर|
पुकार है यह युद्घ की,
धरा तेरी अशुद्ध की,
ऐसे दुश्मनों का आज अंत कर|
अश्व अस्त्र गज से युक्त,
तू सारे बन्धनों से मुक्त,,
साथ तेरे सर्वशक्तिमान है|
म्रत्यु जब न अंत है,
किसका फिर आतंक है?
सर्वस्व आपना आज दे लड़ा|
खड़ी जो उसकी फौज हो,
प्रचंड तेरी ओज हो,
सनसनी लहू में उसके भर तू दे|
खडग कटार बाँण से,
तू जैसे भी हो प्राण ले,
वीर तू तभी तो कहलायेगा|
शीश उसका काट तू,
तन को उसके बाँट तू,
युद्घभूमि में रक्त रस बहे|
अंग अंग भंग हो,
न साथी कोई संग हो,
अपने दुश्मनों का ऐसा नाश कर|
जो तर गया सो जीत है’
जो मर गया तो रीत है,
वीर को सदा जग है पूजता|
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